बचपन हर गम से बेगाना होता है..कहीं खो न जाएं बचपन की खुशियां : आजकल बच्चों मे खाने के प्रति बढती अरुचि(Distaste with Food) और समाधान,

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 कहते हैं बचपन हर गम से बेगाना होता है। अब तक ऐसा माना जाता था कि बचपन बेफिक्री का दूसरा नाम है, पर आजकल बच्चों में भी उदासी बढने लगी है। बच्चों को भला किस बात की टेंशन..? खेलकूद और मौज-मस्ती की दुनिया में खोए रहने वाले नन्हे-मुन्नों में डिप्रेशन की बात थोडी अटपटी जरूर लगती है, पर सच्चाई यह है कि आजकल महानगरों में रहने वाले बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। वैसे तो हम सब अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी परवरिश देने की कोशिश करते हैं, फिर भी कई बार कुछ ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं, जिन पर व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसी नकारात्मक स्थितियां केवल बडों को ही नहीं, बल्कि बच्चों को भी प्रभावित करती हैं, जो आगे चलकर डिप्रेशन की मुख्य वजह बन जाती है।

कैसे करें पहचान :-


अब सवाल यह उठता है कि पेरेंट्स को इस बात का अंदाजा कैसे हो कि उनके बच्चे को डिप्रेशन हो रहा है? इसके लक्षणों को जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर बच्चे का व्यक्तित्व दूसरे से अलग होता है। इसके अलावा बच्चों का मानसिक विकास तेजी से हो रहा होता है। ऐसी स्थिति में अकसर उन्हें मूड स्विंग की समस्या का भी सामना करना पडता है। उनकी क्षणिक उदासी को डिप्रेशन समझना भी गलत होगा। अगर यहां दिए लक्षणों में से कोई भी तीन लक्षण लगातार तीन सप्ताह तक दिखाई दें तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में बच्चे को डिप्रेशन होने की आशंका रहती है।

  • व्यवहार में चिडचिडापन
  • अकसर उदासी और निराशा भरी बातें करना
  • दोस्तों के साथ खेलने और लोगों से मिलने-जुलने से कतराना
  • अति संवेदनशीलता अर्थात छोटी-छोटी बातों से दुखी होना
  • अपनी हार न स्वीकारना
  • भोजन में अरुचि या ओवरईटिंग
  • अनिद्रा या बहुत ज्यादा सोना
  • छोटी-छोटी बातों पर नाराज होकर चीखना-चिल्लाना
  •  एकाग्रता में कमी
  • बेवजह थकान महसूस होना
  • बार-बार पेट या सिर में दर्द और बुखार की शिकायत, सामान्य स्थिति में दवाएं लेने से दो-तीन दिनों में यह समस्या दूर हो जाती है, लेकिन डिप्रेशन में दवाओं का कोई असर नहीं होता। - अपनी मनपसंद एक्टिविटीज और हॉबीज के प्रति उदासीनता
  •  हर बात पर सॉरी बोलना और खुद को दूसरों से कमतर समझना।
यह जरूरी नहीं है कि हर बच्चे में ये सभी लक्षण समान रूप से दिखाई दें। बच्चों के व्यक्तित्व और व्यवहार पर उनके परिवार, स्कूल और आसपास के वातावरण का बहुत गहरा प्रभाव पडता है। इसी वजह से अलग-अलग बच्चों में ये लक्षण भी अलग ढंग से दिखाई देते हैं। इसके अलावा सबसे जरूरी बात यह है कि अगर बच्चे के व्यवहार में अचानक कोई बडा बदलाव नजर आए, जैसे-स्कूल और दोस्तों में दिलचस्पी न लेना, पढाई और एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटीज में तेजी से पिछडना और चेहरे के हाव-भाव में स्थायी रूप से उदासी दिखाई देना आदि डिप्रेशन के ऐसे प्रमुख लक्षण हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

कब होती है समस्या :-


वैसे तो यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन जहां तक चाइल्डहुड डिप्रेशन का सवाल है तो 3 से 5 और 13 से 16 आयु वर्ग में डिप्रेशन की आशंका सबसे अधिक होती है। पहली अवस्था में बच्चे के जीवन में कई बडे बदलाव आ रहे होते हैं। मसलन, घर में छोटे भाई/बहन का जन्म, पहली बार स्कूल जाना और वहां के नए माहौल के साथ एडजस्टमेंट से जुडी समस्याएं आदि। ऐसे में अगर परिवार और स्कूल से इमोशनल सपोर्ट न मिले तो उसे डिप्रेशन हो सकता है। इसी तरह 13 से 16 साल की उम्र में वे किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे होते हैं। इस दौरान उनके शरीर में तेजी से हॉर्मोन संबंधी बदलाव आ रहे होते हैं और अचानक उनसे पेरेंट्स की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ जाती हैं। इस उम्र में सही मार्गदर्शन बेहद जरूरी होता है। अन्यथा, वे डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।

क्यों बढ रहा है मर्ज :-


बच्चों में बढता डिप्रेशन पूरे समाज के लिए बेहद चिंताजनक है। इसे दूर करने के लिए हमें इस समस्या की जडों को ढूंढना होगा। अब तक किए गए अनुसंधानों से यह तथ्य सामने आया है कि महानगरों के एकल परिवारों में रहने वाले बच्चों में अधिकतर यह समस्या देखने को मिलती है। इसकी सबसे बडी वजह यह है कि आजकल ज्यादातर परिवारों में इकलौते बच्चे होते हैं और बढती महंगाई की वजह से माता-पिता दोनों को नौकरी करनी पडती है। ऐसी स्थिति में उनके पास बच्चे के लिए समय नहीं होता। वह उनसे बातें करना चाहता है, पर ऑफिस से लौटने के बाद माता-पिता घर के दूसरे कार्यो में व्यस्त हो जाते हैं। इससे वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है। यही अकेलापन और उदासी कुछ समय बाद उसे डिप्रेशन का मरीज बना देती है। अगर पेरेंट्स के व्यवहार में चिडचिडापन हो या वे अपनी खीझ बच्चे पर उतारते हों तो इससे उसे डिप्रेशन हो सकता है।

आज हर पेरेंट अपने बच्चे को अव्वल नंबर पर देखना चाहता है। अगर किसी वजह से बच्चा उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता तो वह खुद को दोषी मानने लगता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन का कारण बन जाता है। इसके अलावा जीवनशैली की व्यस्तता और संयुक्त परिवारों का टूटना भी बच्चों में डिप्रेशन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। इसके अलावा महानगरों में परिवार की भावनात्मक जरूरतों को समझने वाला सपोर्ट सिस्टम तेजी से खत्म हो रहा है। पहले रिश्तेदारों और पडोसियों के साथ लोग अपने जीवन की समस्याओं के बारे में खुल कर बातचीत करते थे और वे यथासंभव एक-दूसरे की मदद भी करते थे, पर लोगों की व्यक्तिवादी सोच ने उन्हें आत्मकेंद्रित बना दिया है। इससे वे एक-दूसरे के सुख-दुख में साझीदार नहीं हो पाते। बच्चों की परवरिश पर इन बातों का निश्चित रूप से नकारात्मक प्रभाव पडता है। पहले बच्चों को माता-पिता के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों का जो प्यार और संरक्षण मिलता था, आज के बच्चे उससे वंचित हैं। यही बातें उसे धीरे-धीरे डिप्रेशन की ओर धकेलने लगती हैं।

जांच एवं उपचार :-


अगर यहां बताए गए तरीकों पर अमल करने के बावजूद बच्चे में लगातार तीन महीने तक डिप्रेशन के लक्षण दिखाई दें तो विशेषज्ञ से उसकी जांच कराएं। सिर्फ बच्चे और पेरेंट्स से बातचीत के जरिये ही उन्हें समस्या की गंभीरता का अंदाजा हो जाता है। बच्चे के साथ पेरेंट्स की काउंसलिंग की जाती है। उपचार के दौरान आमतौर पर कॉग्नेटिव, बिहेवियरल और इंटरपर्सनल थेरेपी की मदद ली जाती है और इनकी मदद से क्रमश: नकारात्मक सोच को सकारात्मक बनाने, नुकसानदेह आदतों या व्यवहार को सुधारने और दूसरों के साथ सहज रहने के लिए उन्हें सही सामाजिक व्यवहार सिखाया जाता है। अगर सही ढंग से काउंसलिंग दी जाए तो लगभग तीन महीने के बाद ही इस समस्या के लक्षण दूर हो जाते हैं।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आसपास के माहौल में डिप्रेशन की कोई वजह दिखाई नहीं देती, फिर भी बच्चे को यह समस्या होती है। ऐसी दशा में थायरॉयड और विटमिन बी-12 की जांच कराई जाती है क्योंकि थायरॉयड ग्लैंड के सही ढंग से काम न करने और विटमिन बी-12 की कमी की वजह से भी बच्चों में डिप्रेशन हो जाता है। ऐसी अवस्था में विटमिन और दवाओं का नियमित सेवन जरूरी होता है। इससे पेरेंट्स को चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि उपचार के बाद बच्चे पूर्णत: स्वस्थ हो जाते हैं।

कैसे करें बचाव :-

  •  बच्चे के साथ पेरेंट्स के रिश्ते में इतनी सहजता होनी चाहिए कि वह उनके साथ बेझिझक अपने दिल की बातें शेयर कर सके।
  • रोजाना उसके साथ बातचीत का समय निकालें। ध्यान रहे कि उस दौरान पढाई के बारे में पूछताछ और उपदेश बिलकुल न हो। उससे हलकी-फुलकी बातें करें। वह जो भी कहना चाहे, उसे खुलकर बोलने दें और उसके मन को समझने की कोशिश करें।
  • घर का माहौल खुशनुमा बनाए रखें। यदि आप दोनों के बीच कोई मतभेद हो तो उसे जल्द से जल्द दूर कर लें, क्योंकि ज्यादा झगडने वाले पेरेंट्स के बच्चों को भी डिप्रेशन की समस्या होती है।
  • कई बार कुछ दुर्घटनाओं या किसी करीबी रिश्तेदार की मृत्यु के सदमे से भी बच्चों को डिप्रेशन हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चे को कुछ समय के लिए उस दुखद माहौल से दूर कर देना चाहिए।
  • अगर आप सिंगल पेरेंट हैं तो अपने बच्चे को भरपूर लाड-प्यार दें और हमेशा उसे सुरक्षित होने का एहसास दिलाएं। अपना मनोबल कभी न गिरने दें क्योंकि पेरेंट्स की मन:स्थिति का बच्चे के व्यक्तित्व पर सीधा असर पडता है।
  • बच्चे को उसकी रुचि से जुडी एक्टिविटीज में आगे बढने और नए दोस्त बनाने के लिए प्रेरित करें।
  • उसके स्कूल और दोस्तों के बारे में पूरी जानकारी रखें।
  • उसके अच्छे गुणों की प्रशंसा करें।