इलेक्ट्रॉनिक गैजेट(Electronic Gadget) और हमारी सेहत :मोबाईल से कैंसर और टीवी कम करता है आयु । क्या कहते हैं विशेषज्ञ ?

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शमीम खान
शहरी जीवन में गैजेट्स की भूमिका काफी बढ़ गई है। ऑफिस में कम्प्यूटर, घर में टीवी और हर कदम पर मोबाइल के साथ हम गैजेट्स पर निर्भर हो गए हैं। ये गैजेट हमें किस तरह से नुकसान पहुंचाते हैं और हम इनके दुष्प्रभाव से कैसे बचे रह सकते हैं, बता रही हैं शमीम खान ।

आज गैजेट्स के बिना जिंदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। कम्प्यूटर, मोबाइल, टीवी आदि पर निर्भरता हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। इंटरनेट के बढ़ते क्रेज ने मनोवैज्ञानिकों को भी चिंतित कर दिया है। उनमें यह बहस छिड़ी हुई है कि इंटरनेट से लोगों के बढ़ते हुए लगाव को क्या नाम दिया जाए।
कुछ इसे ‘इंटरनेट एडिक्शन’ नाम देते हैं।

लेकिन कम्यूटर का उपयोग भी हर क्षेत्र में हो रहा है। बच्चों के खेल अब मैदानों पर नहीं, वीडियो गेम पर ही होते हैं, जो एक विशेष तरह के कंप्यूटर ही होते हैं। इसलिए इसे ‘कंप्यूटर एडिक्शन’ कहें तो ज्यादा ठीक रहेगा। इनकी उपयोगिता को देख कर इन्हें वरदान कहा जाएगा, लेकिन इस वरदान के साथ छिपा हुआ एक श्राप भी है। सावधानी बरत कर आप इस श्राप से बच सकते हैं।

कम्प्यूटर की लत(Addition) का सेहत पर प्रभाव :-


दिन में पांच घंटे से ज्यादा कम्प्यूटर के सामने बैठने को कम्प्यूटर एडिक्शन कहा जाता है। इसके अनेक हानिकारक प्रभाव हैं, मसलन जीवन शैली में तीव्र बदलाव, शारीरिक सक्रियता कम हो जाना, स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना, नींद की कमी या स्लीप पैटर्न बिगड़ जाना, समाज से कट जाना और परिवार और दोस्तों को समय न देना। सेहत पर लैपटॉप के दुष्प्रभाव कम्प्यूटर से काफी अधिक हैं।

लैपटॉप के हानिकारक प्रभाव :-


लैपटॉप को थोड़ी देर इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका प्रचलन डेस्कटॉप से भी अधिक हो रहा है। लैपटॉप के महत्व और उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। केवल जरूरत है तो समझदारी से उपयोग की।

गर्दन में दर्द,खिंचाव,पाश्चर का बिगड़ना :-


लैपटॉप में स्क्रीन और की-बोर्ड काफी नजदीक स्थित होते हैं। इस कारण इस पर काम करने वाले को झुकना पडम्ता है। इसे गोद में रख कर इस्तेमाल करने पर गर्दन को झुकाने की आवश्यकता पड़ती है। इससे गर्दन में खिंचाव होता है, जिससे दर्द होता है। कभी-कभी तो डिस्क भी अपनी जगह से खिसक जाती है। लैपटॉप पर ज्यादा समय तक काम करने से शरीर का पॉश्चर बिगड़ जाता है।

अँगुलियों में दर्द और आँखों में जलन :-


लैपटॉप में की-बोर्ड कम जगह में बनाया जाता है, इसलिए इसमें अंगुलियों को अलग स्थितियों में काम करना पड़ता है। इससे अंगुलियों में दर्द होता है और कई बार अंगुलियां सूज भी जाती हैं। चमकती स्क्रीन पर लगातार घूरने से आंखों में चुभन हो सकती है। आंखें लाल हो जाना, उनमें खुजली होना और धुंधला दिखाई देना कुछ सामान्य समस्याएं हैं।

स्पाइन, नर्व व मांसपेशियां :-


जब हम लंबे समय तक लैपटॉप का उपयोग करते हैं तो इससे स्पाइन मुड़ जाती है। इससे स्प्रिंग की तरह काम करने की गर्दन की जो कार्यप्रणाली है, वह प्रभावित होती है। इससे तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त भी हो सकती हैं। ज्यादा समय तक गोद में रख कर लैपटॉप पर काम करने से पैरों की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचता है।

क्या आप जानते हैं आपका जीवनकाल कम कर रहा है टीवी :-


ब्रिटिश जनरल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित एक लेख के अनुसार 25 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों द्वारा हर घंटे देखे गये टीवी से उनका जीवनकाल 22 सेकेंड कम हो जाता है। हर भारतीय एक सप्ताह में औसतन 15-20 घंटे टीवी देखता है। कई शोधों में यह बात सामने आई है कि टीवी के सामने हर रोज दो घंटे बिताने से टाइप 2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा 20 प्रतिशत बढ़ जाता है।

मोबाइल फोन से कैंसर का खतरा :-


वायरलेस उपकरणों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें कैंसर का कारण बनती हैं और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन विशेषज्ञों में इनसे होने वाले नुकसानों को लेकर मतभेद है। कुछ का कहना है कि इनके हानिकारक प्रभावों के बहुत कम उदाहरण हैं। सेलफोन यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जब कोई व्यक्ति 50 मिनट तक सेलफोन का उपयोग करता है तो मस्तिष्क के जिस ओर फोन रख कर वह बात करता है, वहां ग्लुकोज की मात्रा दूसरी ओर से अधिक होती है। लेकिन अभी तक इसके कारणों का पता नहीं चला है। यह सामान्य रूप से स्वीकार्य है कि कैंसर के विकास के लिए डीएनए का डैमेज होना आवश्यक है, लेकिन मोबाइल से निकलने वाली विकिरणों से कैंसर होने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। डेनमार्क में हुए एक अध्ययन के अनुसार सेलफोन के उपयोग और ब्रेन टय़ूमर में कोई संबंध नहीं है। स्वीडन में हुए एक अध्ययन के अनुसार जो लोग 20 वर्ष से कम उम्र में मोबाइल फोन का उपयोग शुरू कर देते हैं, उनमें ब्रेन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

मोबाईल में हेड से संगीत सुनना आपको बना सकता हैं बहरा :-


मोबाइल फोन का उपयोग संगीत सुनने के लिए भी बढ़ गया है। 85 डेसिबल से अधिक तेज ध्वनि आपकी सुनने की क्षमता को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है। हमारी सामान्य बातचीत लगभग 60 डेसिबल की होती है और स्टीरियो हेडफोन से निकलने वाली तरंगें अक्सर 100 डेसिबल तक पहुंच जाती हैं।
मोबाइल फोन का उपयोग करते समय बरतें सावधानी
सेलफोन से निकलने वाले रेडिएशन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर लोग चिंतित हैं। सेलफोन से ब्रेन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन उससे निकलने वाले रेडिएशन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर मतभेद है। वैसे इससे निकलने वाले इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन का स्वास्थ्य पर प्रभाव इस बात पर भी निर्भर रहता है कि आप प्रतिदिन कितनी देर तक मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। इन रेडिएशनों के दिल पर पड़ने वाले प्रभावों से बचने के लिए मोबाइल को ऊपर वाली जेब में दिल के पास न रखें, ताकि उसके ऊतकों में यह रेडिएशन अवशोषित न हों। इसके अलावा मस्तिष्क को इसके हानिकारक प्रभाव से बचाने के लिए हैंड्स फ्री का इस्तेमाल करें।

वीडियो गेम के बच्चों पर प्रभाव :-


करीब 30 साल पहले वीडियो गेम का इस्तेमाल शुरू हुआ। यह खेल का अनूठा रूप है, क्योंकि इसमें आप खुद  जिस खेल में चाहें, शामिल हो सकते हैं। आज बच्चों में इसका प्रचलन इतना बढ़ गया है कि बाहरी गतिविधियां खत्म सी हो गई हैं। अधिक समय तक वीडियो गेम खेलने से बच्चों पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।
ऐसे बच्चे ज्यादा आक्रामक होते हैं। अपने शिक्षकों से ज्यादा बहस करते हैं। अपने साथियों से ज्यादा झगड़ते हैं। पढ़ाई में अच्छा प्र्दशन नहीं करते। आंखों की रोशनी प्रभावित होती है। लगातार बैठे रहने से मोटापा बढ़ता है।

इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स एडिक्शन से बचाव के उपाय :-

 

अपने बच्चे के लिए वीडियो गेम खेलने का समय और अवधि निर्धारित कर दें। उनके इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी नजर रखें। आजकल ऑनलाइन भी कई गेम उपलब्ध हैं। इससे हाइपरएक्टिविटी की समस्या हो जाती है, जिससे ध्यान केन्द्रित करने में समस्या होती है।

कैसा रखें पॉश्चर :-


कंप्यूटर पर काम करते समय द अपोलो क्लिनिक की एमएस (आथरे)डॉं. अपर्णा अग्निहोत्री कहती हैं कि कंप्यूटर के सामने बैठते समय हमारी पीठ सीधी हो, खासकर रीढ़ की हड्डी। कंप्यूटर की स्क्रीन आंखों से 15 डिग्री नीचे की तरफ होनी चाहिए। स्क्रीन से आंखों की दूरी दो फुट होनी चाहिए।टीवी देखते समय टीवी हमेशा पर्याप्त रोशनी में देखें, अंधेरे में नहीं। टीवी आंखों के लेवल से थोड़ा ऊपर हो तो बेहतर रहेगा।
50 मिनट तक सेलफोन का उपयोग करते हैं तो मस्तिष्क में ग्लुकोज का संतुलन बिगड़ता है।
20 वर्ष से कम उम्र में मोबाइल फोन का उपयोग करने वालों में ब्रेन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
85 डेसिबल से अधिक तेज ध्वनि आपकी सुनने की क्षमता को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है।
100 डेसिबल तक पहुंच जाती हैं स्टीरियो हेडफोन से निकलने वाली तरंगें, जबकि 60 डेसिबल की होती है हमारी सामान्य बातचीत।
20 प्रतिशत बढ़ जाता है टाइप 2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा, अगर टीवी के सामने हर रोज दो घंटे बिताते हैं।
22 सेकेंड उम्र कम हो जाती है हर एक घंटे टीवी देखने से। भारतीय लोग औसतन एक सप्ताह में 15-20 घंटे टीवी देखते हैं।

इनके प्रभाव से कैसे बचें ? टीवी के स्क्रीन का आकार बड़ा हो :_


हमेशा बड़ी स्क्रीन के लैपटॉप का इस्तेमाल करें। इसके उपयोग से पॉश्चर पर ज्यादा दबाव नहीं आता। अगर बड़ी स्क्रीन वाला लैपटॉप खरीदेंगे तो उसकी स्क्रीन के साथ की-बोर्ड भी बड़ा होगा। इससे आपकी गर्दन या कलाई पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ेगा। अगर आपके लैपटॉप की स्क्रीन छोटी है तो फॉन्ट का आकार बड़ा रखें। इससे आपकी आंखों पर दबाव नहीं पड़ेगा।

आंखों के लेवल और लैपटॉप स्क्रीन का एंगल समान हो :-

 

लैपटॉप की स्क्रीन आंखों के समान लेवल या एंगल पर होनी चाहिए, ताकि आपको अपनी आंखें स्क्रीन पर रखने के लिए गर्दन को घुमाना या मोड़ना न पड़े। लैपटॉप को कम-से-कम आंखों से एक हाथ की दूरी पर रखें। अलग से माउस का उपयोग करें और उसे लैपटॉप की बगल में रखें। इससे आपको अपनी कलाई को घुमाने का अवसर मिल जाएगा और कलाई के दर्द से बच जाएंगे। लैपटॉप में स्क्रीन और की-बोर्ड काफी करीब स्थित होते हैं, इसलिए अलग से की-बोर्ड का उपयोग करें, ताकि आप की आंखों पर ज्यादा दबाव न पड़े।

हर आधे घण्टे में लें ब्रेक, करें चहलकदमी :-


हर दो घंटे के बाद एक ब्रेक लें या हर आधे घंटे के बाद दो-तीन मिनट के लिए अपनी आंखों को कंप्यूटर से हटा लें। नियमित रूप से ब्रेक लेना अपनी आदत बना लें। कुछ मिनट ऑफिस या घर में इधर-उधर चहलकदमी कर लें। इससे आपकी मांसपेशियों और जोड़ों को आराम मिलेगा।

न्यूज़ स्रोत :- हिन्दुस्तान ।