शिखर पुरुष धर्मवीर भारती : जीवन के प्रति अडिग आस्था का उपन्यास

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डॉ. सुभाष रस्तोगी हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में डॉ.धर्मवीर भारती सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद नये साहित्य के आयोजन में अज्ञेय के बाद भारती जी ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।अज्ञेय के 1952 में प्रकाशित ‘दूसरा सप्तक’ में संकलित उनकी कविताओं की तर्ज पर आगे चलकर नई कविता का स्वरूप काफी हद तक निर्मित हुआ। ‘दूसरा सप्तक’ में संकलित भारती की कविताएं ‘इन फिरोजी होंठों पर बरबाद मेरी जिंदगी’, ‘तुम कितनी सुंदर लगती हो’, ‘जब
तुम हो जाती हो उदास’ आज भी हिन्दी कविता की स्मरणीय कविताओं में से हैं।

 पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी, भारत भारती सम्मान, बिहार सरकार के राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान, महाराष्ट्र गौरव केडि़या न्यास पुरस्कार और व्यास सम्मान से अभिनंदित भारती जी के 5 कविता-संग्रह, 2 उपन्यास, 5 कहानी-संग्रह, 4 निबंध संग्रह, संस्मरण, एक यात्रावृत्त, एकांकी, एक शोध-ग्रंथ व दो अनुवाद काल के भाल पर अंकित हैं। प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में कुछ समय प्राध्यापक रहने के बाद वे 1960 में ‘धर्मयुग’ (साप्ताहिक) के प्रमुख संपादक बने और नवंबर, 1987 में ‘धर्मयुग’ से सेवानिवृत्त हुए। रोमान तत्व उनके कालजयी उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ की भी स्थायी टेक है। इसका पहला संस्करण 1952 में प्रकाशित हुआ था। वर्ष 2015 में इसका उनचासवां संस्करण प्रकाशित हुआ

 यह इस उपन्यास के प्रकाशन का 63वां वर्ष है। इसका रहस्य इस उपन्यास की नई कहन शैली में छिपा हुआ है। इसका नयापन इस बात में है कि इसका गठन बहुत पुराने ढंग का है जिसे आप बचपन से जानते हैं—अलफलैला वाला ढंग, पंचतंत्र वाला ढंग, जिसमें रोज किस्सागोई की मजलिस जुटती है, फिर कहानी में से कहानी निकलती है। ऊपरी तौर पर देखें तो यह ढंग उस जमाने का है जब सब काम फुरसत और इत्मीनान से होते थे; और कहानी भी आराम से और मजे लेकर कही जाती थी। पर क्या भारती को वैसी कहानी वैसे कहना अभीष्ट है? नहीं, यह सीधापन और पुरानापन इसलिए है कि आपमें भारती की बात के प्रति एक खुलापन पैदा हो जाए। बात वह फुरसत का वक्त काटने या दिल बहलाने वाली नहीं है, हृदय को कचोटने, बुद्धि को झिंझोड़कर रख देने वाली है। मौलिकता, अभूतपूर्व पूर्ण शृंखला-विहीन नयेपन में नहीं, पुराने में नयी जान डालने में भी है। धर्मवीर भारती ने ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ में जो प्रयोग किया है वह सोद्देश्य है।

इसकी वजह उन्होंने यह बताई है, ‘बहुत छोटे से चौखटे में काफी लम्बा घटनाक्रम और काफी विस्तृत क्षेत्र का चित्रण करने की विवशता के कारण यह ढंग अपनाना पड़ा है।’ (निवेदन, सूरजा का सातवां घोड़ा, पृ. 11) जब 1992 में श्याम बेनेगल जैसे प्रयोेगधर्मी निर्देशक ने इस उपन्यास पर फिल्म बनाई तो देशभर में दर्शकों ने इसका भरपूर स्वागत तो किया ही, इसे वर्ष 1993 की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। भारती के इस प्रयोगधर्मी उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ में जो सात कहानियां कथावाचक माणिक मुल्ला द्वारा दोपहर को उसके घर में जमने वाली सात अलग-अलग मजलिसों में सुनाई जाती हैं। यह सभी किस्सागो माणिक मुल्ला के व्यक्तित्व से जुड़कर इस अप्रतिम उपन्यास में परिणत हो जाती हैं। हैं तो ये अपने मूल टैक्स्चर में प्रेम कहानियां, लेकिन इनकी रचना आर्थिक- सामाजिक पृष्ठभूमि में हुई है।

कथा नायक और इस उपन्यास के मुख्य पात्र माणिक मुल्ला के शब्द हैं, ‘प्रेम-भावना की नींव आर्थिक संबंधों पर है और वर्ग संघर्ष उसे प्रभावित करता है।’ (पृष्ठ 25)। इस उपन्यास में प्रेम की चरम परिणति तक न पहुंच पाने के यही दो बुनियादी घटक उभरकर सामने आते हैं। सभी कहानियां इसलिए भी अन्योन्याश्रित हैं क्योंकि पहली कहानी की कथा नायिका जमुना है। इस कथा-धारा के नैरन्तर्य की भूमिका में है। वास्तव में उसी की पीड़ा, यातना और नियति कायांतरित होकर लिली उर्फ लीला उर्फ सत्ती की यातना में परिणत हो जाती है। इन तीनों कथा नायिकाओं की आर्थिक नींव चूंकि खोखली है, इसलिए विवाह, परिवार, प्रेम, सभी की नींवें हिल जाती हैं। लेकिन इस सबके बावजूद लेखक की जीवन के प्रति अडिग आस्था निरंतर बनी रहती है। और जीवन के प्रति अडिग आस्था है सूरज का सातवां घोड़ा, ‘जो हमारी पलकों में भविष्य के सपने और वर्तमान के नवीन आकलन भेजता है ताकि हम वह रास्ता बना सकें जिस पर होकर भविष्य का घोड़ा आएगा। (पृ. 79, वही) दरअसल ये सात कहानियां माणिक मुल्ला के खुली आंखों से देखे गये सपने हैं जो उस जिंदगी का शिक्षण करते हैं जिसे आज का निम्र-मध्यवर्ग जी रहा है।

उसमें प्रेम से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है आज का आर्थिक संघर्ष, नैतिकता विशृंखलता, इसीलिए इतना अनाचार, निराशा, कटुता और अंधेरा मध्य वर्ग पर छा गया है। (पृ. 79, वही) अचरज होता है कि डॉ. धर्मवीर भारती ने 1952 में अपनी कहन के मूल सरोकार रोमान को केंद्र में रखकर समय के सांड के सींगों को ऐन सामने से पकड़ने का ऐसा नायाब तरीका कैसे आविष्कृत कर लिया? शायद इसलिए क्योंकि अज्ञेय के शब्दों में वे अपने समय की नई पौध के सबसे मौलिक लेखक हैं। (पृ. 7, भूमिका, वही)