एक सम्पूर्ण आदर्श कक्षा जिसमें सब सीख रहे थे, आइये जाने कैसी थी वह कक्षा ? पढ़ें पूरा आलेख |

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►अनुपमा तिवाड़ी बेहतर शिक्षा के लिए शिक्षाकर्म से जुड़े लोगों का लगातार सीखना और सीखे हुए का उपयोग करते हुए सिखाने का माहौल देना जरूरी है। विद्यालय सीखने – सिखाने की एक अधिकारिक जगह है परन्तु अधिकांश विद्यालयों में या तो सीखना होता है या सिखाना। अतः बेहतर सिखाने के लिए यह जरूरी है कि शिक्षक भी लगातार सीखता रहे। जब तक कक्षा में दोनों प्रक्रियाएँ सीखने और सिखाने की नहीं चलेंगी तब तक कक्षा में या तो सिर्फ सीखना होगा या सिर्फ सिखाना।

“ सन्दर्भ :


 अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन टोंक, राजस्थान में पिछले तीन वर्ष से एक विद्यालय संचालित कर रहा है जिसमें पढ़ने वाले सभी 110 बच्चे 6 किलोमीटर दूर बम्बोर गाँव से आते हैं। मैं फाउण्डेशन में हिन्दी विषय की सन्दर्भ व्यक्ति के रूप में कार्यरत हूँ। मेरे निर्धारित कार्यों में एक काम यह भी है कि मैं फाउण्डेशन के विद्यालय में विषय शिक्षिका / शिक्षक के साथ मिलकर चल रही शिक्षण प्रक्रियाओं में सहयोग करूँ। इसलिए विद्यालय में कभी तो मैं किए जा रहे शिक्षण कार्य का अवलोकन करती हूँ, कभी विषय शिक्षिका के साथ मिलकर बच्चों के साथ काम करती हूँ तो कभी स्वयं बच्चों के साथ शिक्षण कार्य करती हूँ। जिस समय मैं शिक्षण कार्य करती हूँ उस समय शिक्षिका ललिता यदुवंशी मेरे द्वारा किए जा रहे कार्य का अवलोकन करती हैं। इन प्रक्रियाओं पर हम आपस में बातचीत करके शिक्षण कार्य की योजना बनाते हैं। फिर तय करते हैं कि कोई काम और बेहतर किन तरीकों से किया जा सकता है।

कार्ययोजना :-


 मार्च 2014 में हमने कक्षा 6 के 13 बच्चों के साथ हिन्दी विषय के पाठ 16 “साँस–साँस में बाँस“ पर काम किया। हमने योजना में पाठ पढ़ना, पाठ में आए कठिन शब्दों के अर्थ जानना, वाचन करना, उप समूहों में चर्चा करना, चर्चा करके अपने समूह में की गई बात को प्रस्तुत करना और प्रश्नोत्तर करना आदि कार्य शामिल किए। यह हमारी मोटी–मोटी योजना थी। परन्तु इसमें कुछ कार्य बच्चों के साथ काम करते हुए जुड़ते चले गए जिन्होंने बच्चों और हमारी समझ तथा जानकारियों को बढ़ाने में मदद की। इस दौरान शिक्षिका और मैंने तय किया कि मैं भी तीन पीरियड कक्षा में रहूँगी। इस दौरान हम पाठ पर चल रहे काम पर लगातार बातचीत करते रहेंगे। इस पाठ पर शिक्षिका ने दस पीरियड काम किया। बच्चों के साथ यह कार्य जिस प्रकार हुआ उसे मैं यहाँ रख रही हूँ।

कक्षा में शिक्षण कार्य-


शिक्षिका ने सबसे पहले कुछ सरकंडों को दिखाते हुए कक्षा के बच्चों से बातचीत शुरू की। राजस्थान में सरकंडे को लोकभाषा में ‘पानी’ भी कहा जाता है। राजस्थान के गाँवों में पानी / सरकंडा बहुतायत में पाया जाता है। यहाँ के गाँवों में बच्चे बचपन में खेल–खेल में इनसे अनेक प्रकार के खिलौने बनाकर खेलते हैं। परिवेश के सन्दर्भ को लेते हुए शिक्षिका व बच्चों ने कक्षा में इनसे खाट, चश्मा, चारपाई, चटाई, डिब्बा जैसी अनेक चीजें  बनाईं। सभी बच्चों को इन्हें बनाने में बड़ा मजा आ रहा था। चीजों के बन जाने बाद सभी ने एक-दूसरे की बनी चीजों को देखा। शिक्षिका ने सरकंडे का सन्दर्भ लेते हुए बाँस के बारे में बातचीत शुरू की। उन्होंने बच्चों से पूछा कि, ‘आपने कभी बाँस देखा है?’ लगभग सभी बच्चों ने स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा कि हमने देखा है, हमने देखा है। बच्चों ने कहा कि, ‘बाँस इस पानी (सरकंडे) जैसा ही होता है।’ इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनके गाँव में बाँस पर टिकाकर छान की झोंपड़ी बनाते हैं। हमारे गाँव में बूढ़े आदमी बाँस की लाठी लेकर चलते हैं, कई बार जब गाँव में झगड़ा हो जाता है तब भी लोग लाठियाँ चलाते हैं। बाँस से और भी कई तरह की चीजें बनाते हैं जैसे सीढ़ी, टोकरी,डलिया, ढ़ाँच आदि। काफी सारी बातचीत के बाद पाठ पर काम करने के बाद शिक्षिका पाठ पर आईं।

शिक्षण कार्य -


शिक्षिका ने हिन्दी विषय की पुस्तक से पाठ ’साँस – साँस में बाँस’ पढकर बच्चों को सुनाया। इस बीच बच्चे
शिक्षिका के साथ–साथ अपनी पुस्तक में पाठ को देखते रहे। शिक्षिका ने बच्चों को निर्देश दिए कि पाठ में जो शब्द आपको कठिन लग रहे हैं या जिनके बारे में आप नहीं जानते हैं उनके नीचे आप अपनी–अपनी किताब में पेंसिल से अंडरलाइन कर लें। बच्चों ने डलियानुमा, हाथ की कारीगिरी, बुनाई का सफर, शंक्वाकार जैसे 8–10 शब्दों के नीचे लाइन खींची।

 इन शब्दों को शिक्षिका ने बोर्ड पर लिखा और सभी बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आपमें से कौन इन शब्दों के अर्थ बता सकते हैं ? 1-2 शब्दों के अर्थ तो बच्चों ने ही बताए। शिक्षिका यहाँ पूरा वाक्य बोलकर बच्चों को स्वयं अर्थ तक पहुँचने में मदद कर रही थीं। बच्चों ने डलियानुमा का अर्थ बताया कि डलिया जैसा और शंक्वाकार का शंकु जैसे आकार का। अन्य शब्दों के अर्थ शिक्षिका ने पाठ या पुस्तक के अन्त में दिए गए शब्दकोष में ढूँढ़ने के लिए कहा। बच्चों ने कुछ शब्दों के अर्थ वहाँ से ढूँढें। इसके बाद शिक्षिका को 2–3 शब्दों के अर्थ ही बच्चों बताने पड़े। बाद में बच्चों ने स्वयं मौनवाचन करते हुए पाठ को पढ़ा।

पाठ को पढ़ने के बाद इस पर बातचीत हुई। बच्चों ने बताया कि, वास्तव में एक तरह की घास है। यह घासों में सबसे बड़ी होती है। बांस नमी वाले क्षेत्र में बहुत मात्रा में पाया जाता है। उन्होंने नमी वाले उत्तर पूर्वी राज्यों / क्षेत्रों के नाम भी बताए। बच्चों ने यह इस पाठ को पढ़ते हुए जाना। बच्चे चर्चा में अपने अनुभवों को जोड़ते हुए बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि, हमारे गाँव में बाँस और छान से झोंपड़ी बनाते हैं और गाँव में बाँस के 3–4 पेड़ भी लगे हैं। यह सुनकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि बाँस तो नागालैण्ड, असम, अरुणाचल, मणिपुर जैसे नम जलवायु वाले प्रदेशों में ही अधिक पाया जाता है।

राजस्थान में इनके होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है। लेकिन बाद में ध्यान आया कि इन बच्चों के गाँव के पास से बनास नदी निकलती है। हो सकता है इनके गाँव में बाँस के झुरमुट हों। उस समय मुझे अपने बचपन का स्कूल संत फ्रांसिस याद आया जो कि राजस्थान के ही बाँदीकुई कस्बे में था। मेरे बचपन के उस स्कूल में भी एक खूब घना बाँस का झुरमुट था और फिर इक्का– दुक्का पेड़ मैंने डूंगरपुर और बाँसवाड़ा की तरफ भी देखे थे। चर्चा समाप्ति के बाद शिक्षिका ने तीन–तीन बच्चों के समूह बनाए और कहा कि प्रत्येक समूह अपने गाँव के खेत में लगे बाँस के झुरमुट का अवलोकन करके आएगा और यदि उससे सम्बन्धित सवाल हैं तो उनके बारे में भी सोचकर आएगा।

फिर अपन कल उन पर बात करेंगे। अगले दिन एक समूह को छोड़कर बाकी सभी समूह अवलोकन करके आए। बच्चों ने बताया कि खेत में बाँस का खूब घना झुरमुट है, एकदम हरा, उसके पत्ते लम्बे–लम्बे थे लेकिन उसमें फूल नहीं थे। एक बच्चा बाँस की एक पतली सी टहनी भी कक्षा में लेकर आया। सभी बच्चे उस टहनी पर अपनी अँगुलियाँ फेर-फेर उसकी चिकनी सतह की फिसलन को महसूस कर रहे थे। टहनी लाने वाले बच्चे ने टहनी दिखाते हुए पूछा कि, पाठ में तो लिखा है कि बाँस थोड़ाखुरदुरा होता है, पर ये तो चिकना है। मैंने कहा कि, बाँस जब पक जाता है तो उसकी सतह कुछ खुरदरी हो जाती है और वह अधिक मजबूत हो जाता है। एक बच्चा बया का घोंसला भी ले आया था।

सब उसके बारे में भी बात कर रहे थे कि इसका ये दरवाजा है, बया यहाँ से अन्दर घुसती है ये इस तरह टंगा होता है। एक बच्चे ने कहा कि बया कुएँ में भी घोंसले बना लेती है। तो कुछ बच्चे उससे पूछने लगे कि फिर वह घोंसला वहाँ टाँगेगी कैसे? इस पर कुछ बच्चे एक साथ जवाब देने लगे कि पुराने कुएँ की दीवार में जब कोई पेड़ उग आता है तो बया उस पर घोंसला बना लेती है। इस प्रकार की चर्चा के बाद शिक्षिका ने सभी बच्चों के चार उपसमूह बनाए तथा उन्हें पुस्तक में दिए एक–एक प्रश्न चर्चा करने के लिए दिए । बच्चों ने चार उपसमूहों में चर्चा की फिर प्रत्येक समूह से एक बच्चे ने जवाब सभी के बीच प्रस्तुत किए। बच्चों ने इन सवालों के जवाब लिखे -

प्रश्न 1 : बाँस को बूढ़ा बाँस कब कहा जाता है (बूढ़ा बाँस शब्द पाठ में आया है) बूढ़े बाँस की कौन-सी विशेषता होती है जो युवा बाँस में नहीं पाई जाती?

जवाब : उपसमूह में हुई चर्चा के आधार पर प्रस्तुतकर्ता बच्चे ने बताया कि कच्चा बाँस (युवा बाँस) जब पक जाता है तब उसे बूढ़ा बाँस कहते हैं। कुछ बाँस की उम्र छोटी तो कुछ की बड़ी होती है, कुछ बाँस तेजी से तो कुछ थोड़ा कम तेजी से बढ़ते हैं। उन्होंने अपने पूर्व अनुभवों को भी इसमें जोड़ा कि पक जाने के बाद बाँस पीला पड़ जाता है। इस बात को सुनकर कुछ बच्चों ने कहा कि नहीं, सब बाँस पीले पड़ जाएँ यह जरूरी नहीं है। मैंने भी कुछ बाँस के पेड़ ऐसे देखे थे जो कि पुराने होने के बावजूद पीले नहीं पड़े थे। अब बच्चे हमारी राय जानना चाह रहे थे। मैंने कहा कि, कुछ बाँस पुराने हो जाने पर भी पीले नहीं पड़ते हैं। मेरा ध्यान इस ओर भी गया कि बाँसों का पीला पड़ना उनके पक जाने या बूढ़े हो जाने की आवश्यक निशानी नहीं है।

प्रश्न 2 : बाँस की बुनाई मानव इतिहास में कब से शुरू हुई ? ( इसका जवाब पाठ में था।)

जवाब : बच्चों ने लिखा कि जबसे हाथ का काम शुरू हुआ तब से बाँस से आदमी ने कुछ–कुछ बनाना शुरू किया। अब हाथ से लोग खाट, छबड़िया, चटाई, छाजला, बैग, कमरे, खिड़की, दरवाजे और सजावटी सामान भी बनाते हैं। कुछ बच्चों ने पूछा कि कमरे कैसे बनाएँगे ? तो उस समूह के अन्य बच्चों ने बताया कि आसाम में बनाते हैं (यह जानकारी पाठ में दर्ज थी)। शिक्षिका ने जोड़ा कि जिन क्षेत्रों (असम, अरुणाचल प्रदेश) में बारिश बहुत ज्यादा होती है वहाँ जहरीले जानवरों से बचने के लिए लोग लकड़ी के मकान बड़े और मजबूत पेड़ों पर भी
बनाते हैं। बच्चों को यह सुनकर अच्छा लग रहा था। वे इस तरह की बात करने लगे कि लकड़ी के मकान तो बहुत अच्छे लगते होंगे, उनके दरवाजे और खिड़कियाँ भी लकड़ी की होती होंगी। उनकी आँखे कह रही थीं जैसे वे भी ऐसे कमरे / मकान देखना चाहती हों।

प्रश्न 3: बाँस से बनाई जाने वाली चीजें कौन–कौन-सी हैं और सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक तुम्हें कौन-सी लगती है ?
जवाब : बच्चों ने लिखा कि बाँस से बुहारा (झाड़ू), डाकुला (टोकरा), छाबड़ी (टोकरी) बनाते हैं। हमें उनसे बने घर, दरवाजे, खिड़कियाँ आश्चर्यजनक लगते हैं। अन्य बच्चों ने कुछ चीजों के नाम भी इसमें जोड़े। बच्चे आपस में ही चर्चा करते हुए उलझ–सुलझ रहे थे कि टोकरा बड़ा होता है और टोकरी छोटी होती है। किसी के घर में टोकरी तो किसी के घर में डलिया बोलते हैं आदि–आदि।

प्रश्न 4 : एटलस में देखकर बताओ कि बाँस के विभिन्न उपयोग से सम्बन्धित जानकारी देश के किस भू–भाग के सन्दर्भ में दी गई है ? इस सवाल के साथ ही बच्चों ने शिक्षिका से पूछा कि एटलस क्या होता है? शिक्षिका ने कहा कि ये मानचित्रों / नक्शों की किताब जैसी होती है जिसमें कौन-सा क्षेत्र कहाँ है उसमें बारिश, पेड़, नदियों आदि की जानकारी नक्शे और चित्र के रूप में दी हुई होती है, उसमें जो दिखाया जा रहा है उससे सम्बन्धित कुछ–कुछ लिखा भी होता है। जैसा कि एक नक्शा तुम्हारी किताब में दिया हुआ है।

 ऐसे उसमें बहुत सरे नक्शे होते हैं। बच्चों ने आपस में बातचीत करते हुए अपनी पुस्तक में दिए मानचित्र को देखा और उत्तर पूर्वी क्षेत्र के नागालैण्ड, अरुणाचल, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और असम आदि राज्यों के नाम बताए। उन्होंने यह भी बताया कि नागालैण्ड में बाँस के अलावा जूट अधिक होता है और आसाम में चाय की पैदावार अधिक होती है। प्रस्तुत जवाबों को सुनते समय सभी बच्चे एक प्रकार की स्वतंत्रता और सहजता का अनुभव कर रहे थे और अपने अनुभवों के खजाने से बात निकाल–निकालकर सामने ला रहे थे। बच्चों ने यह भी कहा कि कुछ बाँस पीले और कुछ बाँस हमेशा हरे ही रहते हैं। कच्चे बाँस की बात पुनः आई तो मैंने सभी को बताया कि कच्चे बाँस का अचार भी बनता है।

इस पर कुछ बच्चे आश्चर्य करते हुए पूछने लगे कि,उसका अचार कैसे बनता होगा ? मैंने कहा कि,ये तो मुझे पता नहीं लेकिन इसी साल चंपावत (उत्तराखंड) जो कि काफी ऊँचाई पर उत्तर में है, वहाँ से मैं कच्चे बाँस का अचार लाई थी जो कि कुछ खट्टा – खट्टा अच्छे स्वाद का था। कच्चे बाँस में रेशे नहीं होते जैसे कच्चे आम (कैरी) में नहीं होते और उसके पक जाने पर उसमें रेशे बन जाते हैं। एक बच्चे ने बताया कि पके बाँस से नदियों के ऊपर पुल भी बनाए जाते हैं। रमेश ने कहा कि,बाँस को तिरछा गाँठ के पास से काटते हैं जिससे वह फटे नहीं। यह बात तो मुझे अभी तक पता नहीं थी यह बात सुनकर मेरे ध्यान में बाँस की सीढ़ी आई सच में बाँस कुछ तिरछा ही काटा जाता है। मुझे लगा कि बच्चे कितना जानते हैं। उनके पास कितने सारे अनुभव है जो कि कभी–कभी हमारे पास भी नहीं होते। सच में मैंने अभी तक इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया था।

बच्चों ने हमसे पूछा कि बाँस कितनी तरह के होते हैं ? तब हमने कहा कि बहुत तरह के होते हैं परन्तु सही संख्या हम आपको कल बता पाएँगे। इस पाठ पर काम करते समय बच्चों के दिमाग में नए-नए सवाल जन्म ले रहे थे। शिक्षिका और मैंने तय किया कि हम अपने लैपटॉप पर इंटरनेट की मदद से बच्चों को बाँस दिखाएँगे और ये कितनी तरह के होते हैं यह भी बताएँगे। अगले दिन मैं अपना लैपटॉप लेकर कक्षा में गई। मैंने बताया कि दुनिया भर में बाँस की 10,000 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसी कि हमने पहले बात की है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी घास है। यह घास 91 से 122 सेंटीमीटर तक प्रतिदिन बढ़ती है।

हमने बच्चों को लैपटॉप पर बाँस भी दिखाए जो कि कुछ पतले कुछ मोटे, कुछ हरे तो कुछ पीले–भूरे से, कुछ बहुत घने झाड़ीनुमा पास–पास तो कुछ थोड़े कम घने थे। बच्चे लैपटॉप पर बाँस देखकर तथा उनकी संख्या जानकर उनकी वृहदता का अनुमान लगा रहे थे। उस समय उनके चेहरे बहुत ही कौतुहल, उत्सुकता और प्रसन्नता से प्रफुल्लित थे। लैपटॉप देखकर बच्चे उसके बारे में जानने को उत्सुक थे। शिक्षिका ने कहा कि इससे बहुत सारी जानकारियाँ, चित्र, बहुत तरह के आँकड़े, फिल्मों के बारे में जान सकते हैं, गीत सुन सकते हैं और अखबार भी पढ़ सकते हैं। अब जैसे हमें यह नहीं पता था कि बाँस कितने तरह के होते हैं तो हमने लैपटॉप में इंटरनेट की मदद से इसे पता किया। लैपटॉप और कम्प्यूटर एक ही चीज है। लैपटॉप को अपन उठाकर ले जा भी सकते हैं। इसके बाद हमने हमारे पुस्तकालय प्रभारी से बात की। जिससे बच्चे वहाँ कम्प्यूटरों को देख पाएँ। हम सभी पुस्तकालय में गए जहाँ पुस्तकालय प्रभारी ने कम्प्यूटर की कार्य प्रणाली के बारे में सभी बच्चों को बताया और चलाकर भी कुछ चीजें बताईं। शिक्षिका द्वारा बच्चों से कहा गया कि बाँस से सम्बन्धित आपके कुछ और भी प्रश्न हैं तो बताइए ? बच्चों ने चार प्रश्न और रखे।

1. क्या बाँस में फूल आते हैं ?
2. बाँस की खेती कैसे होती है ? इस प्रश्न पर मैंने कहा कि इसकी गन्ने जैसी जो गांठ होती है उसे जमीन में बो देते हैं फिर वह उग आती है, लेकिन सवाल और आगे बढ़ गया कि जंगल में गाँठ बोने तो कोई नहीं जाता फिर जंगल में बाँस कैसे उग आते हैं ? इसका जवाब मेरे पास नहीं था।

3. बाँस हमारे आसपास उगाएँ तो क्या उग जाएगा ? इस पर शिक्षिका ने कहा कि पेड़ या किसी भी वनस्पति के उगने / पनपने के लिए जलवायु, पानी और मिट्टी का उसके अनुकूल होना जरूरी है, जैसा कि हमने पाठ में पढ़ा कि यह नमी वाले जलवायु क्षेत्र में अधिक उगता है लेकिन हमारे यहाँ पानी के पास या नमी वाली जगहों में भी उग सकता है लेकिन मरुस्थल जैसे स्थान पर यह नहीं उग पाएगा।

4. बाँस के और क्या उपयोग हैं ? बाँस के उपयोगों की जो हम बातचीत कर चुके थे उसमें हमने और यह बात जोड़ी कि बाँस से कई प्रकार के वाद्य यन्त्र तम्बूरा, बाँसुरी आदि भी बनाए जाते हैं। इसके बाद पाठ के अन्त में दिए अनुमान, कल्पना पर आधारित प्रश्नों पर बच्चों ने काम किया। इन प्रश्नों पर बच्चे बहुत ही सहज भाव से जवाब लिख रहे थे।

ऊपर बच्चों की ओर से आए प्रश्नों में पहला प्रश्न ऐसा था जिसका हम जवाब नहीं खोज पाए तो हमने फाउण्डेशन में विज्ञान विषय में काम करने वाले सन्दर्भ व्यक्ति से सम्पर्क किया। उन्होंने बताया कि बाँस के जीवनकाल में एक ही बार फूल आते हैं जो कि 30–40 वर्ष में एक बार ही लगते हैं। उनसे निकलकर बीज जंगल में बिखर जाते हैं और वहाँ बाँस के झुरमुट उग आते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को मैं इस तरह देखती हूँ “ सबसे पहले शिक्षक को पाठ पर अपनी तैयारी रखनी जरूरी है उसे काम के प्रति अधिक सजग और सहज रहना चाहिए। एक मोटी– मोटी योजना उसके लिए मार्गदर्शक का कार्य करती है लेकिन बीच में कई बार कुछ चीजें गतिविधि से इतनी जुड़ जाती हैं कि उन्हें वहाँ शामिल कर लेना अच्छा होता है।

 इस कार्य के दौरान मैंने यह महसूस किया कि इसमें मैं, शिक्षिका, बच्चे हम सभी सीख रहे थे। इसमें बच्चों का खेत में जाकर अवलोकन करना, उनसे बनाई जाने वाली चीजों के चित्र बनाना, पुस्तक से पाठ पढ़ना, उपसमूहों और बड़े समूह में चर्चा करना, आपस में जानना, हमसे जानना, लैपटॉप से जानना, पुस्तकालय प्रभारी से जानना, विज्ञान विषय के सन्दर्भ व्यक्ति से जानना ये सब सीखने का हिस्सा बन रहे थे। उस समय जैसे पता ही नहीं चल रहा था कि कौन सीख रहा है और कौन सिखा रहा है? बस मिलकर सीखने-सिखाने का जैसे धीमे–धीमे खजाना खुल रहा था जो सभी को समृद्ध कर रहा था।

मैंने देखा कि हमारी योजना ने एक आधार का काम किया जिसे हम करवाने की अपरिहार्यता मान रहे थे लेकिन सीखना और सीखने को जीना जो बच्चों की ओर से आ रहा था वह ज्यादा जीवंत और ग्राह्य था। कक्षा में चल रही पूरी शिक्षण प्रक्रिया में आनन्द गुथा था। कक्षा में यदि ऐसा माहौल हो तो बच्चे क्यों नहीं सीखेंगे ? क्यों हर दिन विद्यालय नहीं आना चाहेंगे?

साभार : अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन