एडमिशन को लेकर अब स्ट्रेस स्टूडेंट के लिए कुछ खास टिप्स(some special for be a bright student after 12th)

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एडमिशन को लेकर अब स्ट्रेस स्टूडेंट के लिए कुछ खास टिप्स 

http://www.learnkids.in/2016/06/some-special-for-be-bright-student.html
12वीं के बाद नए कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के लिए यंगस्टर्स के दिमाग में बहुत टेंशन रहती है. हम बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे टिप्स जो आपको मदद करेंगे-

सुनो सबकी, करो अपनी : 
सुनो सबकी, करो अपनी, ये लाइन हर यंग जेनेरेशन के लिए फिट बैठती है.चाहे वो करियर के लिए स्ट्रीम सोचने का सिलेक्शन हो या फिर गाड़ी चूज करने का. हमें वही करियर चुनना चाहिए जिसमें हमारा मन हो क्योंकि लाइफ हमारी है तो जीना भी हमें अपनी चॉइस पर ही है. जब मेरा 12वीं का रिजल्ट आया तो मैंने सोच रखा था कि मैं मास कम्युनिकेशन करुँगी। मम्मी पापा बल्कि घर का हर मेंबर अपनी चॉइस देने लगा. किसी ने कहा बीटेक करो, तो किसी ने डॉक्टर बनने की राय दी. पर मैंने तो जर्नलिस्म करने का मन बना लिया था. मैंने सोचा कि इससे मैं ना सिर्फ अपनों के लिए कुछ कर पाऊँगी बल्कि अपने समाज के लिए भी बहुत कुछ कर पाऊँगी।
"मीडिया मेक्स अ बेटर सोसाइटी" ये कोट मेरे लिए सबसे इंस्पाइरिंग है. मीडिया ने हमारी सोच ही नहीं बल्कि चीज़ों को देखने का नजरिया भी बदला है.मीडिया केवल प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक तक ही नहीं सीमित है बल्कि आजकल के ट्रेंड में न्यू मीडिया ने भी अपनी एक अलग जगह बना ली है.मीडिया ने लोगों को जीने का नया तौर तरीका सिखाया है.
-सौम्या त्रिपाठी- (मास कॉम स्टूडेंट)

बी पॉजिटिव, डोंट टेक टेंशन :
स्कूल पास करने के बाद हर बच्चे के दिमाग में टेंशन रहती है कि कहाँ एडमिशन लें, किस फील्ड में करियर बनाए। इसके ऊपर से पेरेंट्स और बाकी रिश्तेदारों का दबाव भी चलता रहता है जिससे और कन्फ्यूजन क्रिएट होता है. इससे बचने के लिए बच्चों को करियर काउंसिलिंग करवानी चाहिए, पेरेंट्स को बच्चों का दोस्त बनकर उनसे उनकी राय जानना चाहिए कि आखिर वो क्या चाहते हैं? उनका इंटरेस्ट किस्में है? दिमाग में कई कंफ्यूजन चलने के कारण बच्चा नेगेटिव सोचने लगता है और कई बार तो वो डिप्रेशन का भी शिकार हो जाता है. ऐसे में पेरेंट्स को बच्चों को समझना चाहिए कि टेंशन मत लो, एडमिशन तो हो ही जाएगा और बी पॉज़िटिव रहने की सलाह दें. इस समय पेरेंट्स ही हैं जो बच्चों को टेंशन फ्री रख सकते हैं.

पेरेंट्स को बनायें अपना दोस्त :
एक बच्चे का दिमाग कोरे कागज के सामान होता है जिसमें पहले परिवार और समाज के लोग लिखना शुरू करते हैं, एक बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता है जहाँ वो सारी चीज़े ओब्सर्व करता है और वहीँ पेरेंट्स भी बच्चों की एक-एक व्यवहार से वाकिफ होतें है परन्तु अक्सर ऐसा देख जाता है कि बच्चों के एडोलसेंट में पेरेंट्स और बच्चे एक दूसरे को समझते हुए भी एक दूसरो को समझा नही पातें और इस तरह दोनों के बीच की समझ कम होने लगती है।


ऐसे में पेरेंट्स और बच्चों के बीच एक दोस्ती का रिश्ता होना चाहिए। ये रिश्ता बनाना बेहद आसान भी हो सकता है और बेहद कठिन भी। ये निर्भर करता है पेरेंट्स और बच्चे इसमें कितना इन्वॉल्व होतें हैं। जितनी ज़िम्मेदारी पेरेंट्स की है उतनी ही ज़िम्मेदारी बच्चों की भी होती है, वो कहतें हैं न ताली एक हाथ से नही बजती। दोस्ती का ये रिश्ता हिचकिचाहट की सारी दीवारें गिरा देता है और जो तालमेल बनता है कि फिर कुछ कहने के लिए किसी शब्द की ज़रूरत नही पढ़ती। अगर आप भी अपने पेरेंट्स के साथ फ्रेंडशिप करने की सोचतें हैं पर इसकी शुरुआत की करने से हिचकिचा रहे है तो आगे बढ़िए और पेरेंट्स के सामने अपनी इस इच्छा को व्यक्त करिये निश्चित रूप से वो आपके इस फैसले में इंटरेस्ट दिखाएंगे क्योंकि हर एक पेरेंट्स अपने बच्चे के सबसे करीब रह कर उन्हें जानना चाहता है और ये उनके लिए भी यह एक अच्छा ऑप्शन होता है।


बच्चों को अपने पेरेंट्स से अपनी सारी लाइक-डिस्लाइक को शेयर करना चाहिए. इससे पेरेंट्स बच्चे के इंट्रेस्ट को समझते हुए उनके करियर चॉइस को भी समझने की कोशिश करते हैं| पेरेंट्स को चाहिए फ्रेंडशिप में वो बच्चे को उस कम्फ़र्ट ज़ोन दें जहाँ बच्चा अपनी सारी बात बिना हिचक कह सके।


अगर आप पेरेंट्स से इक्वल फ्रंडशिप की अपेक्षा रखतें हैं तो आपको भी वो चीज़े कहनी या करनी चाहिए जो उचित हो। पेरेंट्स को बच्चे की गलतियों पर प्यार से समझाने की कोशिश करना चाहिए न कि कठोर शब्दों के साथ।

पेरेंट्स को हमेशा बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे व खुद की क्वालिटीज को समझ सके। लेकिन समझने का काम सिर्फ पेरेंट्स का ही नही है बच्चो को खुद की गलतियों को स्वीकार करना आना चाहिए.

किसी भी रिश्ते में म्यूच्यूअल अंडरस्टैंडिंग की ज़रूरत होती है इसलिए एक दूसरों को सुनना, समझना, और एक दूसरे की प्रॉब्लम को सॉल्व करना और मदद करना ज़रूरी है।

पैरेन्ट्स को अपने बच्चों से नज़दीक रहने के लिए चाहिए की वो उनके फ्रेंड्स से कनेक्टेड रहें ये सबसे अच्छा और प्रभावी तरीका है उनसे जुड़ने का।
इस रिश्तों को बनाते समय कई ट्रिक काम कर जाती हैं और कई फेल भी हो जाती हैं पर ट्रायल एंड एरर से ही हम चीज़ो को सीखते हैं। इस फ्रेंडशिप के रिश्ते को बनाने में मुश्किलें तो काफी आती ही हैं थोड़ा समय भी लगता है, पर एक बार ये रिश्ता कायम हो जाने पर पेरेंट्स और बच्चों के बीच रिश्ता बहुत गहरा हो जाता है।

काउंसिलिंग जरूर कराये :
इग्जाम समय के बाद बच्चों पर दबाव बढ़ जाता हैए उन्हें हर तरफ से सुझाव मिलते रहते है कि ऐसा करोए वैसा करो पर कोई उनसे उनका इन्टरेस्ट नही पूछता.ऐसे में बच्चा डिप्रेशन का शिकार हो जाता हैए उसे कुछ समझ नहीं आता और वो नकारात्मक सोचने लगता है. पेरेन्टस ही है जो बच्चों को समझा सकते हैए इस समय उन्हे काउंसिलिंग की जरूरत होती है जो एक विशेष्ञ अच्छे से दे सकता है.कई बार माँ बाप को भी काउंसिलिंग की जरूरत पड़ती है क्योकि उन्हें नही पता होता कि बच्चे के साथ कैसा वयावहार करे या कैसा न करें.पेरेन्ट्स को ये बात बतानी पड़ती है कि गलत तरह की बात गहरा असर छोड़ जाती है और आगे चलकर खतरनाक साबित हो सकतीण् टेंशन से दूर रखने के लिये उन्हे सही काउंसिलिंग की जरूरत होती है. अगर आपका बच्चा डिप्रेशन का शिकार हो रहा है तो फौरन उसे किसी न्यूरोसर्जन से मिलाये और बच्चें की परेशानी बताये ताकि जल्द से जल्द उन्हें नार्मल किया जा सकें.