हिंदी साहित्यशाला : आनन्दमठ उपन्यास भाग 06

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संध्या होने के पहले ही सन्तान सम्प्रदाय के सभी लोगों ने यह जान लिया कि महेन्द्र के साथ सत्यानन्द स्वामी गिरफ्तार होकर नगर की जेल में बन्द है। इसके बाद ही एक एक दो-दो दस-दस सौ-सौ हजार-हजार की संख्या में आकर संतानगण उसी मठ की चहारदीवारी से संलग्न वन में एकत्रित होने लगे। सभी सशस्त्र थे। सबकी आंखों से क्रोध की अग्नि निकल रही थी, चेहरे पर दृढ़ता और होठों पर प्रतिज्ञा थी। उन लोगों के काफी संख्या में जुट जाने पर मठ के फाटक पर हाथ में नंगी तलवार लिए हुए स्वामी ज्ञानानन्द ने गगन भेदी स्वर में कहा- अनेक दिनों से हम लोग विचार करते आते है कि इस नवाब का महल तोड़कर यवनपुरी का नाश कर नदी के जल में डुबा देंगे- इन सूअरों के दांत तोड़कर इन्हें आग में जलाकर माता वसुमती का उद्धार करेंगे। भाइयों! आज वही दिन आ गया है। हम लोगों के गुरू के भी गुरू परमगुरु जो अनन्त ज्ञानमय सदा शुद्धाचारी, लोकहितैषी और देश हितैषी हैं- जिन्होंने सनातन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा के लिए आमरणव्रत लिया है,प्रतिज्ञा की है- जिन्हें हम विष्णु के अवतार के रूप में मानते हैं, जो हमारी मुक्ति के आधार हैं- वही आज म्लेच्छ मुसलमानों के कारागार में बन्दी है। क्या हम लोगों की तलवार पर धार नहीं है?

बांह फैलाकर ज्ञानान्द ने कहा-इन बाहुओं में क्या बल नही है? छाती ठोकर बोले- क्या इस हृदय में साहस नहीं? भाइयों! बोलो-हरे मुरारे मधुकैटभारे! जिन्होंने मधुकैटभ का विनाश किया है जिन्होनंने हिरण्यकशिपु, कंस,दन्तवक्र,शिशुपाल आदि दुर्जय असुरों का निधन-साधन किया है, जिनके चक्र के प्रचण्ड निर्घोष से मृत्युंजय शंकर भी भयभीत हुए थे जो अजेय है रण में विजयदाता हैं हम उन्हीं के उपासक है, उनके ही बल से हमारी भुजाओं में अनन्त बल है- वह इच्छामय है उनके इच्छा करते ही हम रण- विजयी होंगे। चलो, हम लोग उस यवनपुरी का निर्दलन कर उसे धूलि में मिला दे। उरा शूकर निवास को अग्नि से शुद्ध कर नदी-जल में धो दे, उसका जर्रा जर्रा उड़ा दें। बोलो- हरे मुरारे मधुकैटभारे!
इसके साथ ही उस कानन में भीषण, आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे मुरारे मधुकैटभारे!
इसके साथ ही उस कानन में भीषण आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे मुरारे मधुकैटभारे!
सहस्त्रों कंठों के निर्घोष से आकाश कांपा, वसुन्धरा डगमगायी। सहस्त्रों बाहुओं के घर्षण से असीम निनाद हुआ- हजारों ढालों की आवाज से कानों के पर्दे फटने लगे। कोलाहल करते हुए पशु पक्षी जंगल से निकलकर भागे। इस तरह जंगल से श्रेणीबद्ध शिक्षित सेना की तरह सन्तानगण निकल पड़े। वह लोग मुंह से हरिनाम कहते हुए, मिलित पद- विक्षेप से नगर की तरफ चले। उस अंधेरी रात में पतों का मर्मर शब्द, अस्त्रों की झनकार, कण्ठों का अस्फुट स्वर, बीच बीच में तुमुल स्वर में हरिनाम का जयघोष! धीरे-धीरे, तेजस्वितापूर्वक सरोष सन्तान-वाहिनी ने नगर में आकर नगर को त्रस्त कर दिया। इस अकस्मात ब्रजाघात से नागरिक कहां किधर भागे, पता न लगा। नगर- रक्षक हतबुद्धि हो निश्चेष्ट हो गये।
इधर सन्तानों ने पहुंचते ही पहले राजकारागार में पहुंचकर उसे तोड़ डाला, रक्षकों को चटनी बना दिया और सत्यानन्द तथा महेन्द्र को मुक्त कर कन्धों पर चढ़ाकर संतानगण आनंद से नृत्य करने लगे। हरिकीर्तन का अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। महेन्द्र और सत्यानंद करे मुक्त कर संतानों ने जहां-जहां मुसलमानों का घर पाया, आग लगा दी। यह देखकर सत्यानंद ने कहा-अनर्थक अनिष्ट की आवश्यकता नहीं। चलो, लौट चलो। नगर के अधिकारियों ने संतानों का यह उपद्रव सुनकर सिपाहियों का एक दल उनके दमन के लिए भेज दिया। उनके पास केवल बंदूकें ही नहीं थी। एक तोप भी साथ में थी। यह खबर पाते ही सन्तानगण आनन्द कानन से पलट पड़े, लेकिन लाठी,तलवार और छुरों से क्या हो सकता है? तोप के सामने ये लोग पराजित होकर भाग गये।

शान्ति को बहुत थोड़ी ही उम्र में,बचपन में ही मातृवियोग हो गया था। जिन उपादानों से शान्ति का चरित्र-गठन हुआ है, उनमें एक यह प्रधान है। उसके पिता एक ब्राह्मण अध्यापक थे। उनके घर में और कोई स्त्री न थी।

शान्ति के पिता जब पाठशाला में बालकों को पढ़ाते थे, तो स्वभावत: उनकी बगल में शांति भी आकर बैठती थी। कितने ही छात्र तो पाठशाला में ही रहते थे; अन्य समय में शांति भी उन्हीं में मिलकर खेला करती थी। कभी उनकी पीठ पर चढ़ती थी, कभी गोद में बैठ खेला करती थी। वे लोग भी शान्ति का आदर करते थे।
इस तरह बचपन से ही पुरुष-साहचर्य का प्रथम प्रतिफल तो यह हुआ कि शान्ति ने लड़कियों की तरह कपड़े पहनना सीखा, या सीखा भी तो वह ढंग परित्याग कर दिया- लड़कों की तरह कछाड़ा मारकर धोती पहनने लगी। अगर कोई उसे लड़कियों की तरह कपड़े पहना देता था, तो वह तुरंत उसे खोल देती थी और फिर कछाड़ा मारकर पहन लेती थी। पाठशाला के बालक कभी जूड़ा बांधते न थे, अत: वह न तो चोटी करती थी और न जूड़ा ही। फिर उसे जूड़ा बांध ही कौन देता? घर में कोई औरत तो थी नहीं। पाठशाला के छात्र बांस की फर्राटी में उसके बाल फंसा देते थे और उसके घुंघराले बाल वैसे ही पीठ पर लहराया करते थे। विद्यार्थी ललाट पर चन्दन और भस्म लगाते थे; अत: शान्ति भी चन्दन-भस्म लगाया करती थी। गले में यज्ञोपवीत पहनने के लिए भी शांति बहुत रोया करती थी। फिर भी, संध्यादि नैमित्तिक नियमों के समय वह अवश्य उनके पास बैठकर उनका अनुकरण किया करती थी। अध्यापक की अनुपस्थिति के समय लड़कों ने उसे अश्लील दो-एक संकेत सिखा दिये थे और वे आपस में जो कहानियां कहा करते थे, तोते की तरह शान्ति ने भी उन्हें रट डाला था- भले ही उसका कोई अर्थ न जानती हो।
दूसरा फल यह हुआ कि बड़ी पर शान्ति, लड़के जो पुस्तकें पढ़ा करते थे- उन्हें अनायास ही पड़ने लगी। वह व्याकरण का एक अक्षर भी जानती न थी, लेकिन भट्टि काव्य, रघुवंश, कुमारसंभव, नैषधादि के श्लोक व्याख्या के साथ उसने रट डाले थे। यह देखकर शान्ति के पिता ने उसे थोड़ा प्राथमिक व्याकरण भी पढ़ाना शुरू किया। शान्ति भी शीघ्र से शीघ्र सीखने लगी। अध्यापक भी बड़े विस्मित हुए। व्याकरण के साथ उन्होंने कुछ साहित्य भी उसे पढ़ाया। इसके बाद ही सब गोलमाल हो गया, शान्ति के पिता का स्वर्गवास हो गया।
अब शान्ति निराश्रय हो गयी। पाठशाला भी उठ गयी, छात्र चले गये। लेकिन वे सब शान्ति को प्यार करते थे, अत: उनमें से एक शान्ति को अपने घर ले गया। इसी छात्र ने बाद में सन्तान-सप्प्रदाय में नाम लिखाकर अपना नाम जीवानन्द रखा। हम उन्हें जीवानन्द ही कहेंगे।
उस समय जीवानन्द के माता-पिता जीवित थे। उनको जीवानन्द ने कन्या का विशेष परिचय दिया। पिता-माता ने पूछा- लेकिन अब परायी लड़की का भार अपने ऊपर लेगा कौन? जीवानन्द ने कहा- मै ले आया हूं, इसका भार मै ही लूंगा! माता-पिता ने भी कहा - ठीक है। जीवानन्द कुंवारे थे, उन्होंने शान्ति के साथ शादी कर ली। विवाह के उपरान्त सभी लोग इस सम्बन्ध पर पछताने लगे। सब लोग समझे- तो ठीक नहीं हुआ। शांति ने किसी तरह भी लड़कियों के समान धोती न पहनी, किसी तरह भी वह चोटी बांधने को तैयार न हुई। वह घर में भी अधिक रहती न थी, पड़ोस के लड़कों के साथ बाहर खेला करती थी। जीवानन्द के घर के पास ही जंगल है। शांति उस जंगल में अकेली घुसकर कहीं मोरों, कहीं हरिणों और कहीं सुंदर फूलों की खोज में घूमा करती थी। सास- ससुर ने पहले तो मना किया, फिर डांट-फटकार की, इसके बाद मारा- पीटा और अन्त में कोठरी में बन्द कर दिया। इस डॉट- डपट से शांति बड़ी क्रु द्ध हुई। एक दिन दरवाजा खुला देखकर वह बाहर निकली और बिना किसी से कहे-सुने कहीं चली गयी।
जंगल के अन्दर टेसू के फूलों को लेकर उनसे शांति ने अपने कपड़े रंग डाले और खासी साधुनी बन गयी। उस समय बंगाल में दल के दल संन्यासी घूमा करते थे। शांति भी भिक्षा मांगती-खाती जगन्नाथ क्षेत्र की राह में निकल गयी। थोड़े ही दिनों बाद उसे संन्यासियों का दल मिल गया; वह भी उन्हीं में मिल गयी।
उस समय के सन्यासी आजकल जैसे न होते थे- सुशिक्षित बलिष्ट युद्ध विशारद एवं अन्यान्य गुणों से गुणवान होते थे। वे लोग वस्तुत: एक तरह के राजविद्रोही होते थे- राजाओं का राजस्व लूटकर खाते थे। बलिष्ट बालक पाते ही उनका अपहरण करते थे, उन्हें शिक्षित कर अपने सम्प्रदाय में मिला लिया करते थे। इसलिए लोग उन्हें लकड़-पकड़वा या लकड़ सुॅंघवा भी कहते थे।
शांति बालक संन्यासी के रूप में उनमें मिली थी। संन्यासी लोग पहले कोमल देह देखकर उसे दल में मिलाते न थे; लेकिन शांति की बुद्धि-प्रखरता,चतुरता और कार्यदक्षता देखकर आदरपूर्वक उन्होंने उसे अपने दल में मिला लिया। शांति उनके दल में मिलकर व्यायाम करती थी, अस्त्र चलाना सीखती थी, अत: परिश्रम-सहिष्णु हो उठी। उनके साथ उसने देश- विदेश का भ्रमण किया, अनेक लड़ाइयां देखी और अस्त्र-विद्या में निपुण हो गयी।
क्रमश: उसके यौवन के लक्षण प्रकट होने लगे। अनेक संन्यासियों ने जान लिया कि यह छद्मवेश में स्त्री है। लेकिन अधिकतर संन्यासी उस समय जितेन्द्रिय होते थे, इसलिये किसी ने ध्यान न दिया।
संन्यासियों में अनेक विद्वान भी थे। शांति को संस्कृत में कुछ ज्ञान है, यह देखकर एक संन्यासी उसे पढ़ाने लगा-लेकिन क्या काबुल में गधे नहीं होते? जितेन्द्रिय संन्यासियों में वह संन्यासी कुछ दूसरे ढंग का था। या हो सकता है कि शांति का अभिनव यौवन-सन्दर्भ देखकर वह संन्यासी अपनी इन्द्रियों द्वारा परिपीडि़त होकर अपने को वश में न रख सका हो। अत: वह अपनी शिष्या को श्रृंगार रस के काव्य पढ़ाने लगा और उनकी व्याख्या खोलकर अश्राव्य रूप में सुनाने लगा। उससे शान्ति का अपकार न होकर कुछ उपकार ही हुआ। लज्जा किसे कहते हैं, शान्ति ने यह सीखा ही न था; अब व्याख्या सुनकर स्त्री-स्वभाववश स्वत: उसमें लज्जा का उदय हुआ। पुरुषचरित के ऊपर निर्मल स्त्री-चरित्र की अपूर्व प्रभा उस पर छा गयी-उसने शान्ति के गुणों को समाधिक बढ़ा ही दिया। शान्ति ने पढ़ना छोड़ दिया।

सत्यानंद-महेन्द्र से मैंने ऐसा ही सुना है। अब संध्या समय उपस्थित है, मैं संध्यादि कृत्य के लिए जाता हूं। इसके बाद नये सन्तानों की दीक्षा की व्यवस्था करूंगा।

भवानंद-सन्तानों की? क्या महेन्द्र के अतिरिक्त और भी कोई सन्तान-सम्प्रदाय में सम्मिलित हुआ चाहता है?
सत्यानंद-हां, एक और नय आदमी है। अब से पहले मैने उसे कहीं देखा नहीं था। आज ही मेरे पास आया है। वह बहुत कोमल युवा पुरुष है। उसकी भाव-भंगी और बातों से मैं बहुत प्रसन्न हूं- खरा सोना जान पड़ता है वह! उसके संतान- कार्य की शिक्षा का भार जीवानंद पर है। जीवानन्द लोगों को चित्त-आकर्षण कर लेने में बहुत पटु है।.. अब मै जाऊंगा। तुम लोगों के प्रति मेरा एक उपदेश बाकी है। बहुत मन लगाकर उसे सुनो!
दोनों ही शिष्यों ने करबद्ध हो निवेदन किया-आज्ञा दीजिये।
सत्यानन्द ने कहा-तुम दोनों से यदि कोई अपराध हुआ हो, या आगे करो, तो मेरे वापस आ जाने के पहले प्रायश्चित न करना। मेरे आ जाने पर अवश्य ही प्रायश्चित करना होगा।
यह कहकर सत्यानन्द स्वामी अपने स्थान पर चले गये। भवानन्द और जीवानन्द ने एक-दूसरे का मुंह ताका।
भवानन्द ने पूछा-तुम्हारे ऊपर इशारा है क्या?
जीवानन्द-जान तो पड़ता है! बहन के घर में कन्या को पहुंचाने गया था।
भवानन्द-इसमें क्या दोष है? यह तो निषिद्धि नहीं है! ब्राह्मणी के साथ मुलाकात तो नहीं की है?
जीवानन्द-जान पड़ता है, गुरुदेव ऐसा ही समझते हैं?
(4)
सायंकृत्य समाप्त करने के उपरान्त सत्यानन्द स्वामी ने महेन्द्र को बुलाकर कहा-तुम्हारी कन्या जीवित है।
महेन्द्र-कहां है महाराज?
सत्यानन्द-तु मुझे महाराज क्यों कहते हो?
महेन्द्र-सब यह कहते हैं, इसलिए। मठ के अधिकारियों को भी राजा शब्द से सम्बोधित किया जाता है। मेरी कन्या कहां है, महाराज?
सत्यानन्द-इसे सुनने के पहले एक बात का ठीक उत्तर दो- तुम सन्तान-धर्म ग्रहण करोगे?
महेन्द्र-इसे मैंने मन-ही-मन निश्चित कर लिया है।
सत्यानन्द-तब कन्या कहां है, सुनने की इच्छा न करो!
महेन्द्र-क्यों महाराज?
सत्यानन्द-जो यह व्रत ग्रहण करता है, उसे अपनी पत्‍‌नी, पुत्र, कन्या, स्वजनों से किसी से भी सम्बन्ध नहीं रखना पड़ता-स्त्री, पुत्र, कन्या का मुंह देखने से भी प्रायश्चित करना होता है। जब तक संन्तानों की मनोकामना सिद्ध न हो, तब तक तुम कन्या का मुंह देख न सकोगे। अतएव यदि सन्तान-धर्म ग्रहण करना निश्चित हो, तो कन्या का पता पूछकर क्या करोगे? देख तो पाओगे नहीं।..
महेन्द्र-यह कठिन नियम क्यों, प्रभु?
सत्यानन्द-संन्तानों का काम बहुत ही कठिन है। जो सर्वत्यागी है, उसके अतिरिक्त यह काम और किसी के लिए उपयुक्त नहीं है। मायारज्जु से जिस का चित बंधा रहता है, खूंटे में बंधी घोड़ी की तरह वह कभी स्वर्ग में पहुंच नहीं सकता।
महेन्द्र-महाराज! बात मैंने ठीक-ठीक समझी नहीं। जो स्त्री-पुत्र का मुंह देखता है, वह क्या किसी गुरुतर कार्य का अधिकारी नहीं हो सकता?
सत्यानन्द-पुत्र-कलत्र का मुंह देखने से हम देव कार्य भूल जाते हैं। सन्तान-धर्म का नियम काम और किसी के लिए उपयुक्त नहीं है।
महेन्द्र-तो क्या न देखने से ही कन्या को भूल जाऊंगा?
सत्यानन्द-यदि न भूल सको तो यह व्रत ग्रहण न करो!

सत्यानंद- जीवानन्द, भवानंद और ज्ञानानन्द। शांति ने धनुष और तार लिया; एक झटके में उस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसने धनुष सत्यानंद के पैरों पर फेंक दिया।

सत्यानंद विस्मित और स्तंभित हुए खड़े रह गये। कुछ देर बाद बोले- यह क्या! तुम देवी हो या दानवी।
शांति ने हाथ जोड़कर कहा- मैं सामान्य मानवी हूं, लेकिन ब्रह्मचारिणी हूं।
सत्यानंद- इससे क्या हुआ! तुम क्या बाल विधवा हो? नहीं, लेकिन बाल- विधवा में भी इतना बल नहीं होता, वह तो एकाहारी होती हैं।
शांति- मैं सधवा हूं।
सत्यानन्द- तो क्या तुम्हारे स्वामी का पता नहीं है- निरूदिष्ट है?
शांति- नही, उनका पता है; उन्हीं के उद्देश्य से मै यहां आयी हूं।
मेघ हटकर सहसा निकल आनेवाली धूप की तरह सत्यानंद की स्मृति जाग पड़ी है। उन्होंने कहा- याद आ गया। जीवानंद की पत्नी का नाम शांति है। तुम क्या जीवानन्द की ब्राह्मणी हो? अब शांति शरमा गयी। उसने अपनी जटा से मुंह ढांक लिया मानो कितने ही हाथियों के झुण्ड पद्म पर घिर गये हों। सत्यानन्द ने पूछा -क्यों तुम यह पापाचार करने आयी?
सहसा शान्ति ने चेहरे पर से जटाएं हटाते हुए कहा- इसमें पापाचरण क्या है,प्रभु? पत्नी यदि पति का अनुसरण करे, तो यह पापाचरण कैसे है। संतान धर्मशास्त्र में यदि इसे पापाचार कहते है तो सन्तान धर्म अधर्म है। मैं उनकी सहधर्मिणी हूं। वे धर्माचरण में प्रवृत्त है, मैं भी उनके साथ धर्माचरण में सहयोग देने के लिए ही आयी हूं।
शान्ति की तेजस्विनी वाणी सुनकर,उन्नत ग्रीव स्फीतवक्ष, कम्पित अधर तथा उ”वल फिर भी आंसू भरी आंखें देखकर सत्यानन्द बहुत प्रसन्न हुए; बोले-तुम साध्वी हो; लेकिन देखो बेटी- पत्नी केवल गृहधर्म में ही सहधर्मिणी होती है- वीर-धर्म में रमणी क्या सहयोग करेगी?
शान्ति- कौन अपत्नीक होकर आज तक महावीर हो सका है? सीता के न रहते क्या रामवीर हो सकते? अर्जुन के कितने विवाह हुए थे, जरा गिनिये तो? भीम को जितना बल था, उतनी ही क्या उनकी पत्नियां नहीं थी? कितना गिनाऊँ? फिर क्या आपको बताने की जरूरत है?
सत्यानन्द-बात ठीक है, लेकिन रणक्षेत्र में कौन वीर अपनी पत्नी को संग लेते है?
शान्ति- अर्जुन ने जब दानवी सेना के साथ अन्तरिक्ष में युद्ध किया था, तो उनके रथ को कौन चला रहा था? द्रौपदी के संग न रहते क्या पाण्डव कभी कुरुक्षेत्र में जूझ सकते थे?
सत्यानन्द-वह हो सकता हे, लेकिन सामान्य मनुष्यों का हृदय स्त्रियों में आसक्त रहता है और वही उन्हें कार्य से विरत करता है। इसीलिए सन्तानों का यह व्रत है कि वे कभी स्त्री के साथ एकासन पर न बैठेंगे। जीवानन्द मेरा दाहिना हाथ है। क्या तुम मेरा दाहिना हाथ काट देने के लिए आयी हो?
शान्ति- मैं आपके हाथ में बल बढ़ाने के लिए आयी हूं। मैं ब्रह्मचारिणी हूं, और प्रभु के समीप ब्रह्मचारिणी ही रहूंगी। मैं केवल धर्माचरण के लिए आयी हूं, स्वामी-दर्शन के लिए नहीं- विरह यंत्रणा से मैं कातर नहीं हूं। पतिदेव ने जो धर्म ग्रहण किया है, मैं उसकी भागिनी क्यों न बनूं? इसीलिये आयी हूं।
सत्यानन्द- अच्छा तो कुछ दिन तुम्हारी परीक्षा करके देखूंगा।
शान्ति बोली- क्या मैं आनन्द मठ में रह सकूंगी?
सत्यानन्द-आज और कहां जाओगी?
शान्ति- इसके बाद?
सत्यानन्द- मां भवानी की तरह तुम्हारे ललाट पर अग्नि तेज है, सन्तान सम्प्रदाय को क्यों भस्म करोगी?
इसके बाद आशीर्वाद देकर सत्यानन्द ने शांति को विदा किया।
शांति मन ही मन बोली-रहो बूढ़े भगवान! मेरे कपाल में आग है? मैं मुंहजली हूं कि तेरी दादी मुंहजली है?
वस्तुत: सत्यानन्द का वह अभिप्राय नही था- आंखों के विद्युत प्रकाश से ही उनका मतलब था लेकिन यह बात क्या बुड्ढों को युवतियों से कहनी चाहिये?

उस रात शांति को मठ में रहने की अनुमति मिली थी, इसीलिए वह कमरा खोजने लगी। अनेक कमरे खाली पड़े हुए थे। गोव‌र्द्धन नाम का एक परिचारक था- वह भी छोटी पदवी का सन्तान था- वह हाथ में प्रदीप लिये हुए शांति को कमरे दिखाने लगा। कोई कमरा शांति को पसन्द न आया। हताश होकर गोव‌र्द्धन शांति को सत्यानन्द के पास वापस ले जाने लगा। शांति बोली- भाई सन्तान! इधर की तरफ जो कई कमरे है, उन्हें तो नहीं देखा गया!
गोव‌र्द्धन बोला- वह सब कमरे है तो अवश्य बहुत सुन्दर किन्तु उनमें सन्तान लोग है।
शांति- उसमें कौन कौन है?
गोव‌र्द्धन- बड़े बड़े सेनापति है।
शांति- बड़े बड़े सेनापति वे सेनापति कौन है?
गोव‌र्द्धन- भवानन्द, जीवानन्द, धीरानन्द, ज्ञानानन्द- आनन्द मठ आनन्दमय है!
शांति- चलो न, जरा वे कमरे देख आएं।
गोव‌र्द्धन पहले शांति को धीरानन्द के कमरे में ले गया। धीरानन्द महाभारत का द्रोणपर्व पढ़ रहे थे- अभिमन्यु ने किस तरह सप्तमहारथियों के साथ युद्ध किया था, इसी में उनका चित्त निविष्ट था। वे कुछ न बोले। शांति बिना कुछ बोले-चाले आगे बढ़ गयी।
इसके बाद शांति ने भवानन्द के कमरे में प्रवेश किया। उस समय भवानन्द उ‌र्ध्वदृष्टि किये किसी के चेहरे की याद में तल्लीन थे। किसका चेहरा, यह नहीं जानते, लेकिन चेहरा बड़ा सुन्दर है- कृष्ण-कुंचित सुगन्धित अलकराशि आकर्णप्रसारी भ्रूयुग के ऊपर पड़ी हुई है, मध्य में अनद्य त्रिकोण ललाट देश है, उस पर मृत्यु की कराल कालछाया ग्रहण की तरह जान पड़ती है- मानो वहां मृत्यु और मृत्युंजय में द्वन्द्व हो रहा हो! नयन मूंदे हुए, भौंहे स्थिर, ओंठ नीले, गाल पीले, नाक शीतल, वक्ष उन्नत, वायु कपड़े को हिला रही है। इसके बाद ही जैसे शरतमेघ में विलुप्त चन्द्रमा क्रमश: मेघदल को अतिक्रम कर अपना सौंदर्य विकसित करता है; जैसे प्रभात का सूर्य तरंगाकृति मेघमाला को क्रमश: सुवर्णरंग से रंजित कर स्वयं प्रदीप्त होता है, दिग्मण्डल को आलोकित करता है, स्थल, जल, कीट-पतंग सबको प्रफुल्ल करता है- वैसे ही उस शांत देह में आनंदमयी शोभा का संचार हो रहा था। आह! कैसी अनुपम शोभा थी! भवानन्द यही ध्यान कर रहे थे, अत: उन्होंने भी कोई बात न कही। कल्याणी के रूप से उनका हृदय कातर हो गया था, शांति के रूप की तरफ उन्होंने ध्यान ही न दिया।

व्याधा जैसे हरिण के पीछे दौड़ता है, वैसे ही वह संन्यासी शान्ति को देखकर उसके पीछे दौड़ता था। किन्तु शान्ति ने व्यायाम आदि के कारण पुरुष-दुर्लभ बल-संचय किया था। अध्यापक के समीप आते ही वह उन्हें जोर के घूंसे और लात जमाती थी, जो साधारण न होते थे। एक दिन एकान्त होकर संन्यासी ने बड़ा जोर लगातार शान्ति का हाथ पकड़ लिया। शान्ति हाथ छुड़ा न सकी। लेकिन संन्यासी ने दुर्भाग्यवश शान्ति का बायां हाथ पकड़ा था, अत: दाहिने हाथ से शान्ति ने संन्यासी के सिर में इस जोर का घूंसा जमाया कि संन्यासी कटे पेड़ की तरह धड़ाम से चकराकर गिर पड़े। शान्ति ने संन्यासी सम्प्रदाय का त्याग कर पलायन किया।

शान्ति निर्भय थी, अकेली अपने गांव की तरफ चल पड़ी। साहस और बाहुबल से वह निर्विघ्न यात्रा करती रही। भिक्षा मांगकर और जंगली कन्द-मूल आदि फलों से अपनी क्षुधा मिटाती वह अनेक आपदाओं में विजय-लाभ करती अपने ससुराल आ पहुंची। उसने देखा, श्वसुर का स्वर्गवास हो गया है; लेकिन सास ने उसे घर में स्थान न दिया-जाति जाने का डर था। शान्ति तुरन्त बाहर निकल गयी।
जीवानन्द घर में ही थे। उन्होंने शान्ति का पीछा और उसे राह में पकड़कर पूछा-तुम मेरा घर छोड़कर कहां चली गयी थीं? इतने दिनों तक कहां रहीं? शान्ति ने सारी सच्ची बातें कह दीं। जीवानन्द को सच-झूठ की परख थी। उसने शान्ति की बात का विश्वास किया।
अप्सराओं के भ्रूविलास से युक्त कटाक्ष-ज्योति द्वारा निर्मित जो काम-शेर है, उसका अपव्यय-पुष्प घन्वा मदनदेव विवाहित दम्पतियों के प्रति नहीं किया करते। अंगरेज पूर्णिमा की रात को भी शाही राह पर गैस या बिजली जताते हैं, बंगाली देह में लगाने वाले तेल का ढाल देते हैं; मनुष्यों की बात तो दूर हैं, सूर्य देव के उदय के बाद भी कभी-कभी चन्द्रदेव आवास में उदित रहते हैं, इन्द्र सागर पर भी वृष्टि करता है; जिस सन्दूक में छिपाकर धनराशि रखी रहती है, कुबेर उसी सन्दूक से धन ले जाते हैं; यमराज जिसके घर से सबको ले गये रहते है, प्राय: उसी घर के बचे हुए लोगों से दृष्टि डालते है, केवल रतिप्रति ऐसी निर्बुद्धिता नहीं करते-जहां वैवाहिक गांठ बंध जाती है, वहां फिर वे परिश्रम नहीं करते-प्रजापति को सारा भार देकर, जहां किसी के हृदय के रक्त को उत्तेजित कर सकें, मदनदेव वहीं जाते हैं। लेकिन आज तो जान पड़ता है पुष्पधन्वाको और कोई काम था-एकाएक उन्होंने दो पुष्पवाणों का अपव्यय किया-एक ने आकर जीवानन्द के हृदय को वेध दिया-दूसरे ने शान्ति के हृदय में प्रवेश कर उसे बता दिया यह स्त्रियों का कोमल हृदय है। नवमेघ से छलके प्रथम जलकणों से भींगी पुष्पकलिका की तरह शान्ति सहसा खिलकर जीवानन्द के मुंह के तरफ निहारती रही।
जीवानन्द ने कहा- मैं तुम्हें परित्याग न करूंगा। मैं जब तक लौटकर न आऊं, तुम यहीं खड़ी रहना।
शांति ने पूछा-तुम लौटकर आओगे न?
जीवानन्द और कोई उत्तर न देकर, और किसी की परवाह न कर, राह की बगल में नारियल वृक्षों की छाया में शांति के अधरों पर अधर रख, सुधपान कर चले गये।
माता को समझा-बुझाकर और विदा लेकर जीवानन्द तुरंत लौट आये। हाल में ही जीवानन्द की बहन निमाई की शादी भैरवीपुर में हुई थी। बहनोई के साथ जीवानंद का प्रेम था। जीवानंद शांति को लेकर वही गये। बहनोई ने उन्हें थोड़ी जमीन दी; जीवानन्द ने उस पर एक कुटी का निर्माण किया और वहीं शांति के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। स्वामी के सहवास में शांति का पुरुष भाव धीरे-धीरे गायब होने लगा। सुख स्वप्न की तरह उनका जीवन बीतने लगा। लेकिन सहसा वह सुख स्वप्न भंग हो गया- सत्यानन्द के हाथ में पड़कर जीवानन्द सन्तान धर्म ग्रहण कर शान्ति का परित्याग कर चले गये। पतित्याग के बाद यह प्रथम मिलन निमाई के प्रयत्न से हुआ, जिसका वर्णन पूर्व परिच्छेद में हो चुका है।

जीवानन्द के चले जाने पर शान्ति निमाई के दरवाजे पर जा बैठी। निमाई गोद में लड़की को लेकर उसके पास आ बैठी। शांति की आंखों में नहीं है, उसने उन्हें पोंछ डाला है, बल्कि चेहरे पर मधुर मुस्कराहट है। फिर भी वह कुछ तो गम्भीर चिन्तायुक्त अनमनी सी दिखाई पड़ती ही है, उसे देखकर निमाई बोली- मुलाकात तो हो गयी न? शान्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह चुप रही। निमाई ने देखा कि शान्ति किसी तरह मन का भाप न बताएगी। शान्ति मन की बताना पसन्द भी नहीं करती, यह जानती हुई भी निमाई ने बात का ढर्रा उठाया, बोली-बता दो भाभी! यह कन्या कैसी है?

दूसरे दिन आनंदमठ के अन्दर एक कमरे में बैठे, निरुत्साह तीन संताननायक आपस में बातें कर रहे थे। जीवानन्द से सत्यानन्द से पूछा- महाराज! ईश्वर हम लोगों पर इतने अप्रसन्न क्यों हैं? किस दोष से हम लोग मुसलमानों से पराभूत हुए?

सत्यानंद ने कहा- भगवान अप्रसन्न नहीं हैं। युद्ध में जय-पराजय दोनों होती है। उस दिन हम लोगों की विजय हुई थी, आज पराजय हुई है, अन्त में फिर जय है। हमें निश्चित भरोसा है कि जिन्होंने इतने दिनों तक हमारी रक्षा की है, वे शंक -वक्र-गदाधारी वनमाली फिर हमारी रक्षा करेंगे। उनके पदस्पर्श कर हम लोग जिस महाव्रत से व्रती हुए हैं,अवश्य ही उस व्रत की हम लोगों को साधना करनी होगी- विमुख होने पर हमें अनन्त नरक का भोग करना पडे़गा। हम अपने भावी मंगल के बारे में नि:संदेह है। लेकिन जैसे देव-अनुग्रह के बिना कोई काम सिद्ध हो नहीं सकता, वैसे ही पुरुषार्थ की भी आवश्यकता होती है। हम लोग जो पराजित हुए उसका कारण था कि हम नि:शस्त्र थे- गोली-बन्दूक के सामने लाठी, तलवार,भाला क्या कर सकता है! अत: हम लोग अपने पुरुषार्थ के न होने से हारे हैं। अब हमारा यही कर्तव्य है कि हमें भी अस्त्रों की कमी न हो।
जीवानन्द- यह तो बहुत ही कठिन बात है।
सत्यानन्द-कठिन बात है, जीवानन्द? सन्तान होकर तुम मुंह से ऐसी बात निकालते हो? सन्तानों के लिए कठिन है क्या?
जीवानन्द-आज्ञा दीजिये, इनका संग्रह किस प्रकार होगा?
सत्यानन्द-संग्रह के लिए आज रात मैं यात्रा करूंगा। जब तक मैं लौटकर न आऊं, तब तक तुम लोग किसी भारी काम में हाथ न डालना। लेकिन सन्तानों का आपस की एकता की रक्षा करना, उनके भोजन-वस्त्र की व्यवस्था करना- इसका भार तुम दोनों पर ही है।
भवानंद ने पूछा-तीर्थयात्रा कर इन चीजों का संग्रह आप कैसे करेंगे? गोला-गोली, बन्दूक, तोप खरीदकर भेजवाने में बड़ा गोलमाल होगा; फिर आप इतना पाएंगे कहां, बेचेगा ही कौन, ले ही कौन आएगा?
सत्यानन्द -यह सब चीजें खरीदकर लाई जा नहीं सकती। मैं कारीगर भेजूंगा, यही तैयार करनी होंगी।
जीवानन्द-क्या यहीं, इसी आनन्दमठ में?
सत्यानन्द-यह कैसे हो सकता है-इसके उपाय की चिंता मैं बहुत दिनों से कर रहा हूं। भगवान ने अब उसका सुयोग उपस्थित कर दिया है। तुम लोग कहते थे-भगवान प्रतिकूल हैं, लेकिन मैं देखता हूं कि भगवान अनुकूल हैं।
भवानंद-कहां कारखाना खोलेंगे?
सत्यानंद-पदचिन्ह में।
जीवानंद-यह कैसे? वहां कैसे होगा?
सत्यानंद-नहीं तो महेन्द्रसिंह को मैंने किसलिए व्रत ग्रहण करने को इतना तैयार किया है?
भवानंद-महेन्द्र ने क्या व्रत ग्रहण कर लिया है?
सत्यानंद-व्रत ग्रहण नहीं किया है, लेकिन आज ही रात में उसे दीक्षित करूंगा।
जीवानंद-कैसे? महेन्द्र को व्रत ग्रहण करने के लिए क्या उपाय हुआ है-हम लोग नहीं जानते। उसकी स्त्री-कन्या का क्या हुआ? उन्हें कहां रखा गया? आज नदी किनारे मैने एक कन्या पायी थी; उसे मैने अपनी बहन के पास पहुंचा दिया है। उस कन्या के पास एक सुन्दर स्त्री मरी पड़ी हुई थी। वही तो महेन्द्र की स्त्री-कन्या नहीं थी? मुझे ऐसा ही भ्रम हुआ था।
सत्यानंद-वही महेन्द्र की स्त्री-कन्या थी।
भवानंद चमक उठे अब वह समझ गये कि जिस स्त्री को उन्होंने पुनर्जीवित किया है, वही महेन्द्र की पत्‍‌नी कल्याणी है। लेकिन उसकी कोई बात इस समय उठाना उन्होंने उचित न समझा।
जीवानंद ने पूछा-महेन्द्र की स्त्री मरी कैसे?
सत्यानंद-जहर खाकर।
जीवानंद-जहर क्यों खाया?
सत्यानंद-भगवान ने स्वप्न में उसे प्राण-त्याग करने का आदेश किया था।
भवानंद-वह स्वप्नादेश क्या सन्तानों के कार्याें के लिए ही हुआ था?

सत्यानन्द- सन्तान दो तरह के हैं-दीक्षित और अदीक्षित। जो अदीक्षित हैं, वे या तो संसारी हैं अथवा भिखारी। वे लोग केवल युद्ध के समय आकर उपस्थित हो जाते हैं; लूट का हिस्सा या पुरस्कार पाकर फिर चले जाते हैं। जो दीक्षित होते हैं, वे सर्वस्वत्यागी हैं। यही लोग सम्प्रदाय के कत्र्ता हैं। तुम्हें मैं अदीक्षित सन्तान होने का अनुरोध न करूंगा। युद्ध के समय लाठी-लकड़ीवाले अनेक लोग हैं। बिना दीक्षित हुए सम्प्रदाय के किसी गुरुतर कार्य के अधिकारी तुम हो नहीं सकते।

महेन्द्र- दीक्षा क्या है? दीक्षित क्यों होना होगा? मैं तो अब से पहले ही मन्त्र ग्रहण कर चुका हूं।
सत्यानंद- उस मंत्र का त्याग करना होगा।
महेन्द्र- मन्त्र का त्याग करूंगा कैसे?
सत्यानन्द- मै वह पद्धति बता देता हूं।
महेन्द्र- नया मन्त्र क्यों लेना होगा?
सत्यानन्द- सन्तागण वैष्णव हैं।
महेन्द्र- यह मै समझ नहीं पाता हूं कि सन्तान वैष्णव कैसे हैं। वैष्णवों का तो अहिंसा ही परमधर्म होता है।
सत्यानन्द- वह चैतन्य देव का वैष्णव-धर्म है। नास्तिक बौद्ध धर्म के अनुकरण से जो वैष्णवता उत्पन्न हुई थी, उसी का लक्षण है। प्रकृत वैष्णव-धर्म का लक्षण दुष्टों का दमन और धरित्री का उद्धार है। कारण, भगवान विष्णु ही संसार के पालक हैं। उन्होंने दस बार शरीर धारणकर पृथ्वी का उद्धार किया था। केशी, हिरण्यकशिपु, मधु-कैटभ, पुर, नरक आदि दैत्यों का, रावणादि राक्षसों का तथा शिशुपाल आदि का संहार उन्होंने किया है। वहीं जेता, जयदाता, पृथ्वी के उद्धारकर्ता और सन्तानों के इष्ट देवता हैं। चैतन्यदेव का वैष्णव धर्म वास्तविक वैष्णव-धर्म नहीं है-वह धर्म अधूरा है। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय हैं- लेकिन भगवान केवल पे्रममय ही नहीं हैं, वे अनंत शक्तिमय भी हैं। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय ही नहीं हैं,वे अनंत शक्तिमय भी हैं। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय है, सन्तानों के विष्णु केवल शक्तिमय हैं। हम दोनो ही वैष्णव हैं-लेकिन दोनों ही अधूरे हैं। बात समझ गये?
महेन्द्र- नहीं! यह तो कैसी नयी-नयी-सी बातें हैं। कासिमबाजार में एक पादरी के साथ मेरी मुलाकात हुई थी। उसने भी कुछ ऐसी ही बातें कही थी। अर्थात ईश्वर प्रेममय है-तुम लोग यीशु से प्रेम करो-यह भी ऐसी ही बातें हैं!
सत्यानन्द- जिस तरह की बातों से हमारे चौदह पुरखे समझते आते हैं-उसी तरह की बातों से हम तुम्हें समझा रहे हैं। ईश्वर त्रिगुणात्मक है- यह सुना है?
महेन्द्र- हां, सत्व, रजस, तमस-यही तीन गुण हैं।
सत्यानंद- ठीक । इन तीनों गुणों की पृथक-पृथक उपासना होती है। उनके सत्व से दया-दक्षिणा आदि की उत्पत्ति होती है। वे अपनी उपासना भक्ति द्वारा करते हैं- चैतन्य सम्प्रदाय यही करता है। रजोगुण से उनकी शक्ति की उत्पत्ति होती है; इसकी उपासना युद्ध द्वारा, देवद्वेषीगण के निधन द्वारा होती है-वहीं हम करते हैं। और तमोगुण से ही भगवान भगवान अपनी साकार चतुर्भुज आदि विविध मूर्ति धारण करते हैं। केसर-चन्दनादि उपहार द्वारा उस गुण की पूजा होती है-सर्व साधारण वही करते हैं. अब समझे?
महेन्द्र- समझ गया-संतानगण उपासक सम्प्रदाय मात्र है।
सत्यानंद- ठीक है! हम लोग राज्य नहीं चाहते-केवल मुसलमान भगवान के विद्वेषी हैं- इसलिए समूल विनाश करना चाहते हैं।

सत्यानन्द बातचीत समाप्त कर महेन्द्र के साथ उठकर उस मठस्थित देवालय में जहां विराट आकार की भगवान विष्णु की मूर्ति विराजित थी, वहीं पहुंचे। उस समय वहां अपूर्व शोभा थी- रजत,स्वर्ण और रत्नरंजित प्रदीपों से मंदिर आलोकित हो रहा था; राशि-राशि पुष्पों की शोभा से मंदिर और देव मूर्ति शोभित थी; सुगन्धित मधुर धूमराशि से कक्ष वस्तुत: देवसान्निध्य का प्रमाण उपस्थित कर रहा था। मंदिर में एक और पुरुष बैठा हुआ- हरे मुरारे स्तोत्र का पाठ कर रहा था। सत्यानंद के वहां पहुंचते ही उसने उठकर उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मचारी ने पूछा- तुम दीक्षित होगे?
उसने कहा- मुझ पर कृपा कीजिये!

पैर छूकर महेन्द्र के विदा होने पर, उनके संग उसी दिन जो दूसरा शिष्य दीक्षित हुआ था, उसने आकर सत्यानन्द को प्रणाम किया। सत्यानन्द ने उसे आशीर्वाद देकर बैठाया। इधर-उधर की मीठी बातें होने के बाद स्वामीजी ने कहा- क्योंजी, भगवान कृष्ण में तुम्हारी प्रगाढ़ भक्ति है या नहीं!

शिष्य ने कहा- कैसे बताऊं? मैं जिसे भक्ति समझता हूं, शायद वह भंडैती या आत्मप्रतारणा हो!
सत्यानन्द ने सन्तुष्ट होकर कहा- ठीक है, जिससे दिन-प्रतिदिन भक्ति का विकास हो, ऐसी ही कोशिश करना। मैं आशीर्वाद देता हूं, तुम्हारी साधना सफल हो! कारण तुम अभी उम्र में बहुत युवा हो। वत्स! क्या कहकर बुलाऊं- अब तक मैंने पूछा नहीं।
नवसन्तान ने कहा- आपकी जो अभिरुचि हो! मै तो वैष्णवों का दासानुदास हूं।
सत्यानन्द- तुम्हारी नई उम्र देखकर तुम्हें नवीनानन्द बुलाने की इच्छा होती है, अत: तुम अपना यही नाम रखो! लेकिन एक बात पूछता हूं, तुम्हारा पहले क्या नाम था? यदि बताने में कोई बाधा हो, तब भी बता देना। मुझसे कहने पर बात दूसरे कान में न पहुंचेगी। सन्तानधर्म का मर्म यही है कि जो अवाच्य भी हो, उसे भी गुरू से कह देना चाहिए। कहने में कोई हानि न होगी।
शिष्य- मेरा नाम शान्ति देव शर्मा है।
सत्यानन्द- तुम्हारा नाम शान्तिमणि पापिष्ठा है।
यह कहकर सत्यानन्द ने शिष्य की डेढ़ हाथ लम्बी काली-काली दाढ़ी को बांए हाथ से पकड़कर खींच लिया, नकली दाढ़ी अलग हो गयी। सत्यानन्द ने कहा- छि: बेटी! मेरी साथ ठगी? - और मुझे ही ठगना था तो इस उम्र में डेढ़ हाथ की दाढ़ी क्यों? और दाढ़ी तो दाढ़ी, यह कण्ठ का स्वर- यह आंखाें की कोमल दृष्टि छिपा सकती हो? मै यदि ऐसा ही निर्बोध होता तो क्या इतने बड़े काम में कभी हाथ डालता?
बेशर्म शान्ति कुछ देर तक अपनी आंखों को हाथ से ढांके बैठी रही। इसके बाद ही उसने हाथ हटाकर वृद्ध पर मोहक तिरछी चितवन डालकर कहा- प्रभु! तो इसमें दोष ही क्या है? स्त्री के बाहुओं में क्या बल नहीं रहता?
सत्यानन्द- गोष्पद में जितना जल होता है!
शान्ति- सब सन्तानों के बाहुबल की परीक्षा कभी आपने की है?
सत्यानन्द- की है।
यह कहकर सत्यानन्द एक इस्पात का धनुष और लोहे का थोड़ा तार ले आये। उसे शांति को देते हुए उन्होंने कहा- इसी इस्पात के धनुष पर लोहे के तार की डोरी चढ़ानी होगी। प्रत्यंचा का परिणाम दो हाथ है। डोरी चढ़ाते-चढ़ाते धनुष सीधा हो जाता है और चढ़ानेवाले को दूर फेंक देता है। जो इसे चढ़ा सकता है, वही वास्तव में बलवान है।
शांति ने धनुष और तार को अच्छी तरह देखकर पूछा- सभी संतान क्या इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हैं!
सत्यानन्द- नहीं, इसके द्वारा केवल उन लोगों के बल की थाह ले ली है।
शांति- क्या कोई भी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो नहीं सका?
सत्यानंद- केवल चार व्यक्ति।
शान्ति- क्या मैं पूछ सकती हूं कि वे कौन-कौन हैं?
सत्यानंद- हां, कोई निषेध नहीं है- एक तो मैं स्वयं हूं।
शांति- और?

शान्ति ने कहा- यह लड़की कहां से पायी -तेरे लड़की कब हुई रे।

मेरी नहीं, दादा की है!
निमाई ने शान्ति को जलाने के लिए यह बात कही थी, दादा की लड़की माने यह कि उसने भाई से यह लड़की पायी है। लेकिन शान्ति ने यह न समझा कि निमाई उसे चिढ़ाने के लिए कह रही है। अतएव शान्ति ने उत्तर दिया -मैं लड़की के बाप की बात नहीं पूछती हूं, मैं यह पूछती हूं कि इस लड़की की मां कौन है?
निमाई उचित दण्ड पाकर अप्रतिभ होकर बोली-कौन जाने किसकी लड़की है, दादा क्या जाने कहां से पकड़कर उठा लाये हैं - पूछने का भी अवसर न मिला। आजकल अकाल के दिनों में कितने लोग लड़के-बच्चे फेंक जाते हैं। मेरे ही पास कितने लोग अपनी सन्तान बेचने के लिए आये थे। लेकिन दूसरों के बाल-बच्चों को ले कौन? (फिर उन आंखों में सहसा जल भर आया और निमाई ने उसे पोंछ डाला) लड़की है बड़ी सुन्दर! भोली-भाली, गोरी-चिट्टी देखकर दादा से मैंने मांग ली है।
इसके बाद शान्ति की निमाई के साथ अनेक तरह की बातें होने लगीं। फिर निमाई के पति को घर लौट आते देख शान्ति उठकर कुटी में चली गयी।
कुटी में पहुंचकर उसने अपना दरवाजा बन्द कर लिया। इसके बाद चूल्हे की जितनी राख वह बटोर सकी, बटोर ली। बची हुई राख के ऊपर जो अपने खाने के लिए उसने चावल पका रखे थे, उन्हें भी वहां से हटा दिया। इसके उपरान्त बहुत देर तक सोच में पड़ी रही और फिर आप-ही-आप बोली- इतने दिनों से जो सोच रखा था, आज वहीं करूंगी। जिस आशा से इतने दिनों तक नहीं किया, आज सफल हुई-सफल क्यों, निष्फल-निष्फल! यह जीवन ही निष्फल है। जो किया है वही करूंगी एक बार में जो प्रायश्चित है, वही सौ बार में भी है।
यह सोचती हुई शान्ति ने भात चूल्हे में फेंक दिया। जंगल में से कन्द-मूल-फल ले आई और अन्न के बदले उन्हीं को खाकर उसने अपना पेट भर लिया। इसके बाद उसने वही ढाका वाली साड़ी निकाली जिस पर निमाई का इतना आग्रह था। उसका किनारा उसने फाड़ डाला और शेष कपड़े को गेरू के रंग में रंग दिया। वस्त्र को रंगतें और सुखाते शाम हो गई। शाम हो जाने पर दरवाजा बन्द कर शान्ति बड़े तमाशे में लग गयी। माथे के आजानुलम्बित केशों का कुछ का कुछ अंश उसने कैंची से काट डाला और अलग रख दिया। बाकी बचे हुए उस कपड़े को उसने दो भागों में विभक्त कर दिया- एक तो उसने पहन लिया और दूसरे से अपने ऊपरी अंगों को ढंक लिया। इसके बाद उसने बहुत दिनों से काम में न लाया गया शीशा निकाला और उसमें अपना रूप देखते हुए सोचा-हाय! मैं क्या करने जा रही हूं? इसके बाद ही दु:खी हृदय से वह अपने उन काटे हुए बालों को लेकर मूंछ और दाढ़ी बनाने लगी। लेकिन उन्हें वह पहन न सकी। उसने सोचा- छि:! यह क्या? अभी क्या इसकी उम्र है। फिर भी बुड्ढे को चरका देने के लिए इन्हें रख लेना अच्छा है? यह सोचकर उसने छिपाकर उन्हें अपने पास रख लिया। इसके बाद घर में से एक बड़ा हरिणचर्म निकालकर उसने गले के पास उसे पहनकर गांठ दी और घुमाकर शरीर आवृत कर जंघों तक लटका लिया। इस तरह सज्जित होने के बाद इस नये संन्यासी ने घर में एक बार चारों तरफ देखा। आधी रात हो जाने पर, शान्ति ने इस प्रकार संन्यासी वेश में दरवाजा खोलकर अन्धकारपूर्ण गम्भीर वन में प्रवेश किया। वनदेवियों ने उस एकान्त रात में अपूर्व गायन सुना-
(बंगला यथावत)
(1)
दूरे उडि़ घोड़ा चढि़ कोथा तुमी जाओ रे,
समरे चलि तू आमि हाम ना फिराओ रे
हरि-हरि हरि-हरि बोलो रणरंगे
झांप दिबो प्राण आजि समर-तरंगें,
तुमि कार कि तोमार केलो एसो संगे,
रमण ते नाहिं साध, रणजय गाओ रे !

(2)
पाये धरी प्राणनाथ आमा छेड़े जेओ ना,
एई सुनो, बाजे घन रणजय बाजना।
नापिछे तुरंग मोर रण करे कामना,
उडि़ुलो आमार मन घरे आर रबो ना।
रमधी ते नाहिं साथ, रणजय गाओर।

सत्यानन्द- तुम लोग इन भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो कि संतान-धर्म के सारे नियमों का पालन करोगे!

दोनों- करूंगा।
सत्यानन्द- जितने दिनों तक माता का उद्धार न हो, उतने दिनों तक गृहधर्म का परित्याग किये रहोगे?
दोनों- करूंगा।
सत्यानन्द- माता-पिता का त्याग करोगे?
दोनों- करूंगा।
सत्यानन्द- भ्राता-भगिनी?
दोनों- त्याग करूंगा।
सत्यानंद- दारा-सुत?
दोनों- त्याग करूंगा।
सत्यानंद- आत्मीय-स्वजन? दास-दासी?
दोनों- इन सबका त्याग किया।
सत्यानंद- धन-सम्पदा-भोग?
दोनों- सबका परित्याग।
सत्यानन्द- इन्द्रियजयी होगे? नारियों के साथ कभी एक आसन पर न बैठोगे?
दोनों- न बैठेंगे; इन्द्रियां वश में रखेंगे।
सत्यानन्द- भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो-अपने लिए या अपने स्वजनों के लिए अर्थोपार्जन नहीं करोगे! जो कुछ उपार्जन करोगे, उसे वैष्णव धनागार को अर्पित कर दोगे!
दोनों- देंगें।
सत्यानन्द- सनातन-धर्म के लिए स्वयं अस्त्र पकड़कर युद्ध करोगे?
दोनों- करेंगे।
सत्यानन्द- रण में कभी पीठ न दिखओग?े
दोनों- नहीं।
सत्यानन्द- यह प्रतिज्ञा भंग हो तो?
दोनों- जलती चिता में प्रवेश कर अथवा विषपान कर प्राण त्याग देंगे।
सत्यानन्द- और एक बात है, और वह है जाति। तुम किस जाति के हो? महेन्द्र तो कायस्थ है। तुम्हारी जाति?
दूसरे व्यक्ति ने कहा- मै ब्राह्मण-कुमार हूं।
सत्यानन्द- ठीक। तुम लोग अपनी जाति का त्याग कर सकोगे? समस्त सन्तान एक जाति में हैं। इस महाव्रत में ब्राह्मण-शूद्र का विचार नहीं है। तुम लोगों का क्या मत है?
दोनों- हम लोग भी जाति का ख्याल न करेंगे। हम सब माता की सन्तान एक जाति के हैं।
सत्यानन्द- अब मैं तुम लोगों को दीक्षित करूंगा। तुम लोगों ने जो प्रतिज्ञा की है, उसे भंग न करना। भगवान मुरारि स्वयं इसके साक्षी हैं। जो रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, जरासन्ध, शिशुपाल आदि के विनाश-हेतु हैं, जो सर्वान्तर्यामी हैं, सर्वजयी है, सर्व शक्तिमान हैं और सर्वनियन्ता हैं, जो इन्द्र के वज्र को भी बिल्ली के नाखूनों के समान समझते हैं, वहीं प्रतिज्ञा-भंगकारी को विनष्ट कर अनन्त नरकवास देंगे।
दोनों- तथास्तु!
सत्यानन्द- अब तुम लोग गाओ- वन्देमातरम-
दोनों ने मिलकर एक एकांत मन्दिर में भक्ति-भावपूर्वक मातृगीत का गान किया। इसके बाद ब्रह्मचारी ने उन्हें यथाविधि दीक्षित किया।
दीक्षा समाप्त होने के बाद सत्यानन्दजी महेन्द्र को एक बहुत ही एकांत स्थान में ले गये। दोनों के वहां बैठने के बाद सत्यानन्द ने कहना आरम्भ किया-वत्स! तुमने तो यह महाव्रत ग्रहण किया है, उससे मुझे जान पड़ता है कि भगवान सन्तानों पर सदय हैं। तुम्हारे द्वारा माता का महत कार्य सिद्ध होगा। तुम ध्यानपूर्वक मेरी बातें सुनो! तुम्हें जीवानन्द, भगवान के साथ वन-वन घूमकर युद्ध करना नहीं पड़ेगा। तुम पदचिन्ह में वापस लौट जाओ। अपने घर में रहकर ही तुम्हें सन्तान-धर्म का पालन करना होगा।
यह सुनकर महेन्द्र विस्मित और उदास हुए, लेकिन कुछ बोले नहीं। ब्रह्मचारी कहने लगे- इस समय हम लोगों के पास आश्रय नहीं है,ऐसा स्थान नहीं है कि यदि प्रबल सेना आकर घेरकर आक्रमण करे तो हम लोग खाद्यादि के साथ फाटक बन्द कर कुछ दिनों तक युद्ध कर सकें। हम लोगों के पास गढ़ नही है। वहां अट्टालिका भी तुम्हारी है, गांव भी तुम्हारे अधिकार में हैं-मेरी इच्छा है कि अब वहां एक गढ़ तैयार हो। परिखा प्राचीर द्वारा पदचिन्ह को घेर देने से-उसमें खाई, खन्दक आदि युद्धोपयोगी किले-बन्दी कर देने से और जगह-जगह तोपें लगा देने से बहुत ही उत्तम गढ़ तैयार हो सकता है। तुम घर जाकर रहो, क्रमश: दो हजार संतान वहां जाकर उपस्थिति होंगे। उन लोगों के द्वारा खाई-खन्दक प्राचीर आदि तैयार कराते रहो। वहां तुम्हें एक लौह-कक्ष बनवाना होगा; वही संतानों का अर्थ-भण्डार होगा। मैं एक-एक कर सोने से भरे हुए संदूक तुम्हारे पास भेजवाऊंगा। तुम उसी धनराशि से यह सब तैयार कराओ। मैं परदेश जाता हूं। वहां से उत्तम कारीगर भेजूंगा। उनके आ जाने पर तुम पदचिन्ह में कारखाना स्थापित करो। वहां तोपें, गोले, बारूद, बन्दूक आदि निर्माण कराओ। इसीलिए मै तुम्हें घर जाने को कहता हूं।..
महेन्द्र ने स्वीकार कर लिया।