छत्रपति साहूजी महाराज जी जीवनी,आरक्षण के जनक की जीवन गाथा(Biography of Father of Reservation Chhatrapati Sahu ji Maharaj)

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छत्रपति साहूजी महाराज जी जीवनी,आरक्षण के जनक की जीवन गाथा(Biography of Father of Reservation Chhatrapati Sahu ji Maharaj)

06 मई 1922 छत्रपति शाहूजी महाराज स्मृति दिवस
आरक्षण के पितामह, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 95वें स्मृति दिवस  कोटि-कोटि नमन

शाहूजी के जीवन पर जोतिवाराव फुले का काफी प्रभाव था। फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्य शोधक समाज के आन्दोलन का कारवाँ चलाने वाला कोई नायक नहीं था। 1910 से 1911 तक शाहू महाराज ने इस सत्यशोधक समाज के आन्दोलन का अध्ययन किया। 1911 में राजा शाहूजी ने अपने संस्थान में सत्य शोधक समाज की स्थापना की। कोल्हापुर संस्थान में शाहू महाराज ने जगह-जगह गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाएँ स्थापित की।


छत्रपति शाहूजी महाराष्ट्र राज्य के निकट कोल्हापुर संस्थान के राजा थे। ये शूद्र जाति से थे। शूद्रों एवं दलितों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोलकर उन्हें मुक्ति की राह दिखाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबा साहब घाटगे तथा उनकी माता का नाम राधाबाई साहिबा था। शाहूजी के जन्म का नाम यशवंतराव था। आबा साहब; यशवंतराव के दादा थे। चौथे शिवाजी का अंत होने के बाद शिवाजी महाराज की पत्नी महारानी आनंदी बाई साहिबा ने 1884 में यशवंत राव को गोद ले लिया।

इसके बाद यशवंतराव का नाम शाहू छत्रपति रखा गया था। इन्हें कोल्हापुर संस्थान का वारिश भी बना दिया गया था। शाहू महाराज की शिक्षा राजकोट में स्थापित राजकुमार कॉलेज में हुई। राजकोट की शिक्षा समाप्त करके शाहूजी को आगे की शिक्षा पाने के लिए 1890 से 1894 तक धाराबाड में रखा गया। शाहू महाराज ने अंग्रेजी, इतिहास और राज्य कारोबार चलाने की शिक्षा ग्रहण की। अप्रैल 1897 में राजा शाहू का विवाह खान बिलकर की कन्या श्रीमंत लक्ष्मी बाई से संपन्न हुआ। विवाह के समय लक्ष्मी बाई की उम्र महज 11 वर्ष की ही थी।

जब छत्रपति शाहूजी महाराज की आयु. 20 वर्ष थी तब इन्हांने करविर (कोल्हापुर) संस्थान के अधिकार ग्रहण करके सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली तथा शासन करने लगे। कहा जाता है कि जब 1894 में इनका राज्यभिषेक समारोह हुआ तो उनके शूद्र होने की वजह से ब्राह्मणां ने पैर के अँगूठे से उनका राजतिलक किया। इससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई। आमतौर पर सभी राजाआें की छवि जनता की आमदनी को करां के माध्यम से हड़पने एवं जबरन वसूली की थी लेकिन छत्रपति शाहू ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सबसे बड़ा काम राजव्यवस्था में परिवर्तन करके किया। उनका मानना था कि संस्थान की वृद्धि में उन्नति के लिए प्रशासन में हर जाति के लोगां की सहभागिता जरूरी है।

उस समय उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे। जबकि बहुजन समाजके केवल 11 अधिकारी थे। ब्राह्मणां ने एक चाल के तहत बहुजन समाज को शिक्षा से दूर रखा था, ताकि पढ़-खिकर ये सरकारां में शामिल न हो सकें। शाहूजी इस बात से चिंतित रहते थें उन्हांने प्रशासन में ब्राह्मणां के इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए तथा बहुजन समाज की भागीदारी के लिए आरक्षण कानून बनाया। इस क्रान्तिकारी कानून के अंतर्गत बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी। देश में आरक्षण की यह पहली व्यवस्था थी। तब तक बहुजन समाज के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे। उन्हें तिरस्कार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था।

शाहूजी के जीवन पर जोतिराव फुले का काफी प्रम्भाव था। फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्यशोधक समाज आन्दोलन का कारवाँ चलाने वाला कोई नेता नहीं था। 1910 से 1911  तक शाहूजी महाराज ने इस सत्यशोधक समाज आन्दोलन का अध्ययन किया।

1911 मे राजा शाहूजी ने अपने संस्थान में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। कोल्हापुर संस्थान में शाहू महाराज ने जगह-जगह गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाएँ स्थापित की। 18 अप्रैल 1901 में मराठा स्टूडेंट्स इंस्टीट्यूट एवं विक्टोरिया मराठा बोर्डिंग संस्थान की स्थापना की और 47 हजार रूपये खर्च करके इमारत बनवाई। 1904 में जैन होस्टल, 1906 में
मॉमेडन हॉस्टल और 1908  में अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल जैसी संस्था का निर्माण करके शाहूजी महाराज ने शिक्षा फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया जो मील का पत्थर साबित हुआ। अज्ञानी और पिछड़े बहुजन समाज को ज्ञानी, संपन्न एवं उन्नत बनाने हेतु छत्रपति राजा ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समर्पित कर दिया।

06 मई 1922 को बहुजन समाज के हितकारी राजा छत्रपति शाहू महाराज का
परिनिर्वाण हुआ।